Sunday, 14 June 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 14 जून 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

14 जून 2026 (रविवार)




संवाद सभा कार्यवृत्त 

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

विषय: महाकवि जयशंकर प्रसाद : व्यक्तित्व, कृतित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
आयोजक: महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान
दिनांक: 14 जून 2026
समय: सायं 4:00 बजे से 6:45 बजे तक (२ घंटे ४५ मिनट)
माध्यम: गूगल मीट (ऑनलाइन)
संचालक: श्री विशाल मालवीय

1. उद्घोषणा एवं मंच संचालन

श्री विशाल मालवीय
प्रशंसा और सहभागिता : अपनी ओजस्वी वाणी, उत्कृष्ट भाषाई गरिमा और कुशल वक्तृत्व क्षमता के धनी श्री विशाल मालवीय ने इस संगोष्ठी में उद्घोषक (मंच संचालक) की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी सहज, प्रभावमयी और विचारोत्तेजक शैली से न केवल पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोए रखा, बल्कि प्रत्येक सत्र के बीच ऐसा सुंदर सामंजस्य स्थापित किया कि अंत तक श्रोताओं का उत्साह बना रहा। उनका संचालन इस संगोष्ठी की सफलता का मुख्य आधार स्तंभ रहा।

सरस्वती वंदना (मंगलाचरण)

सुश्री सरिता कोहिनूर
सुरों की साधिका और अपनी सुरीली व भावपूर्ण आवाज के लिए सराही जाने वाली सुश्री सरिता कोहिनूर ने ज्ञान की देवी मां शारदे की आराधना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उनके द्वारा प्रस्तुत की गई मंत्रमुग्ध कर देने वाली सरस्वती वंदना ने संपूर्ण सभागार को सकारात्मक ऊर्जा, शांति और आध्यात्मिक दिव्यता से सराबोर कर दिया। उनकी इस प्रस्तुति ने संगोष्ठी के लिए एक अत्यंत पवित्र और गरिमामयी वातावरण तैयार किया।

विशेष वक्तव्य (मुख्य व्याख्यान)
श्री अवधेश कुमार गुप्ता

प्रशंसा और सहभागिता : अपनी अगाध विद्वत्ता, गहन बौद्धिक अनुभव और वैचारिक स्पष्टता के लिए सुविख्यात श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने संगोष्ठी में अपना मुख्य एवं विशेष वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने संगोष्ठी के मूल विषय के गूढ़ और व्यावहारिक पक्षों पर अत्यंत सारगर्भित प्रकाश डाला। उनके तार्किक, शोधपरक और प्रेरणादायी विचारों ने न केवल विषय की समझ को गहरा किया, बल्कि उपस्थित शोधार्थियों और श्रोताओं को एक नई वैचारिक दृष्टि भी प्रदान की।

धन्यवाद ज्ञापन

श्री वरुण सिंह गौतम
प्रशंसा और सहभागिता:  संगोष्ठी के गरिमामयी और सफल समापन की बेला पर सभी अतिथियों, वक्ताओं, तकनीकी टीम और सहभागियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का उत्तरदायित्व श्री वरुण सिंह गौतम ने पूरी निष्ठा के साथ निभाया। उन्होंने अपने सौम्य, शालीन और आत्मीय व्यवहार से कार्यक्रम के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोगियों का आभार प्रकट किया। उनके इस धन्यवाद ज्ञापन ने संगोष्ठी को एक बेहद सकारात्मक, सौहार्दपूर्ण और आत्मीय मोड़ पर पहुँचाकर गरिमापूर्ण विदाई दी।

बैठक का विवरण

महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक विरासत, व्यक्तित्व, कृतित्व एवं उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर केंद्रित राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों, कवियों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत वक्तव्य से हुआ। श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने उपस्थित सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज और जीवन के व्यापक आयामों का साक्षात्कार भी कराता है। उन्होंने रचनाकारों से अपनी दृष्टि को अधिक समावेशी, व्यापक एवं मानवीय बनाने का आह्वान किया तथा लिटरेचरनामा संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

वक्तव्य एवं प्रस्तुतियाँ

श्री अनिल कुमार गुप्ता

उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी साहित्य के छायावाद काल (1918–1938) की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रसाद के साहित्य पर आज भी देश-विदेश में शोध कार्य जारी हैं। साथ ही नालंदा एवं राजगीर जैसे ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों में साहित्यिक स्मृतियों के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री मधुसूदन

उन्होंने जयशंकर प्रसाद को भारतीय संत साहित्यकारों की परंपरा में अत्यंत विशिष्ट स्थान प्रदान करते हुए उनके साहित्य में निहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तथा राष्ट्रीय चेतना का उल्लेख किया। उन्होंने प्रसाद के जीवन एवं साहित्य का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया तथा बिहार की सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कई साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विभूतियों का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक अस्मिता के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे।

श्री मनोज कुमार

उन्होंने जयशंकर प्रसाद की अमर कृति कामायनी के गीतों का भावपूर्ण एवं प्रभावशाली वाचन किया, जिसे श्रोताओं ने अत्यंत सराहा।

श्री विनय दास

उन्होंने प्रेमचंद एवं जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक दृष्टियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने दोनों साहित्यकारों के रचनात्मक सरोकारों और सामाजिक दृष्टिकोण पर विचार व्यक्त किए।

श्री दिनेश दास

उन्होंने कहा कि जीवन का यथार्थ छायावाद की मूल प्रेरणा है। उन्होंने कामायनी में प्रकृति, संवेदना, अंतर्मन और आत्मचिंतन के विविध आयामों की व्याख्या की।

श्रीमती अनीता खरे

उन्होंने कामायनी के श्रद्धा और ध्रुव तत्वों को केंद्र में रखकर काव्य-पाठ प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में आध्यात्मिकता एवं मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई दिया।

श्रीमती प्रियंका पुरोहित

उन्होंने नारी विमर्श विषय पर अपने विचार रखते हुए स्त्री गरिमा एवं सम्मान को समाज की मूल आवश्यकता बताया। महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक उत्तरदायित्व एवं नैतिक मूल्यों पर बल दिया।

श्री सुशील कुमार पांडेय

उन्होंने प्रेमचंद एवं जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए साहित्य की वैश्विक परंपरा और मानवतावादी दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने प्रसाद को महाकवि एवं विश्वकवि के रूप में स्मरण किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री आशीष अम्बर

उन्होंने बिहार की गौरवशाली सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परंपरा पर आधारित प्रभावशाली कविता का पाठ किया, जिसमें सम्राट अशोक, चाणक्य, हिमालय एवं गौतम बुद्ध जैसे प्रतीकों का उल्लेख था।

बहाल कवि

उन्होंने काशी, पंचकोशी यात्रा, मणिकर्णिका घाट तथा बनारस की सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित गीत एवं काव्य प्रस्तुति दी, जिसने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

श्री ठाकुर

उन्होंने कामायनी, छायावाद, प्रकृतिवाद एवं राष्ट्रवाद के विविध आयामों पर केंद्रित कविता पाठ एवं विचार प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति के उपरांत कविता में साधना, अध्ययन और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पर बल दिया गया।

प्रमुख निष्कर्ष

1. महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी भारतीय समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।


2. साहित्य को राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत और मानवीय संवेदनाओं के संवाहक के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।


3. युवा पीढ़ी को जयशंकर प्रसाद सहित भारतीय साहित्य की महान परंपरा से जोड़ने के लिए निरंतर साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।


4. साहित्यिक संवाद, शोध एवं सृजनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने हेतु ऐसे आयोजनों का नियमित आयोजन आवश्यक है।



धन्यवाद ज्ञापन

कार्यक्रम के अंत में श्री वरुण सिंह गौतम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों, श्रोताओं एवं आयोजकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने आयोजन की सफलता में सभी के योगदान की सराहना करते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार के साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता बनाए रखने का अनुरोध किया।

कार्यक्रम का सफल,

सुव्यवस्थित एवं गरिमामय संचालन श्री विशाल मालवीय द्वारा किया गया।

बैठक समाप्ति समय: सायं 6:45 बजे
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान @all

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