✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦
21 जून 2026 (रविवार)
संवाद सभा कार्यवृत्त
राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी
विषय : महाकवि जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम
दिनांक : 21 जून 2026
समय : सायं 4:00 बजे से 6:50 बजे तक
माध्यम : गूगल मीट (ऑनलाइन)
आयोजन : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा
संचालन : विशाल मालवीय
कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम संचालक विशाल मालवीय
राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का शुभारंभ लिटरेचरनामा के प्रधान संपादक एवं कार्यक्रम संचालक विशाल मालवीय द्वारा किया गया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
"शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्तविकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त, विजयिनी मानवता हो जाए।"
का सस्वर पाठ करते हुए कार्यक्रम का आरंभ किया।
उन्होंने उपस्थित सभी विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया। अपने प्रारंभिक उद्बोधन में उन्होंने लिटरेचरनामा तथा महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों संस्थाएँ साहित्य, संस्कृति, भाषा और भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सतत कार्य कर रही हैं।
उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन एवं साहित्य का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि प्रसाद केवल छायावाद के प्रमुख स्तंभ नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, इतिहास, राष्ट्रचेतना और मानवीय मूल्यों के महान व्याख्याता हैं। उन्होंने कामायनी, आँसू, लहर, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी जैसी कृतियों का उल्लेख करते हुए प्रसाद की बहुआयामी प्रतिभा को रेखांकित किया।
सरस्वती वंदना
श्री ठाकुर
इसके पश्चात श्री ठाकुर जी द्वारा माँ सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की गई। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ने ऑनलाइन मंच को भक्तिमय वातावरण से भर दिया। उनकी सुमधुर वाणी ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लिटरेचरनामा एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की ओर से उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया गया।
स्वागत उद्बोधन एवं ट्रस्ट परिचय
कविता प्रसाद
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की अध्यक्षा कविता प्रसाद ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए ट्रस्ट के उद्देश्यों, कार्यों एवं भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद को केवल पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि चिंतक हैं, जिनके साहित्य में राष्ट्र, मानवता, संस्कृति, दर्शन और संवेदना का अद्भुत समन्वय मिलता है।
उन्होंने ट्रस्ट के गठन की पृष्ठभूमि, उसके उद्देश्यों तथा संस्थापक अवदेश कुमार गुप्ता के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद के साहित्य को समाज तक पहुँचाने, शोध को प्रोत्साहित करने तथा युवाओं को भारतीय साहित्य से जोड़ने हेतु ट्रस्ट विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता रहा है।
मुख्य अतिथि
डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
मुख्य अतिथि डॉ. सुशीलकुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ ने आयोजकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि जयशंकर प्रसाद जैसे महाकवि पर केंद्रित संगोष्ठियाँ आज के समय की आवश्यकता हैं।
उन्होंने कहा कि प्रसाद केवल कवि नहीं, बल्कि नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार और दार्शनिक चिंतक भी थे। उनके साहित्य को किसी एक विधा में सीमित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने रोचक ढंग से कहा कि जैसे जयशंकर प्रसाद में "शंकर" हैं, वैसे ही करुणाशंकर उपाध्याय में भी "शंकर" हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में असाधारण साधना और सृजन के प्रतीक हैं।
उन्होंने विशेष रूप से प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की पुस्तक "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक प्रसाद के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
उन्होंने बताया कि यह 464 पृष्ठों का शोधग्रंथ है जिसमें 18 प्रतिमानों के आधार पर प्रसाद की महानता का मूल्यांकन किया गया है। इसमें प्रसाद की आत्मवेदना, विश्ववेदना, आनंदवाद, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना, इतिहासबोध, मानवीय दृष्टि और विश्वमानवता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
मुख्य अतिथि -
प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय
(मुंबई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर और अध्यक्ष , रक्षा विशेषज्ञ )
संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक सत्र प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय का अध्यक्षीय उद्बोधन रहा।
उन्होंने कहा कि छात्र जीवन से ही उन्हें यह अनुभव होता रहा कि हिंदी साहित्य में जयशंकर प्रसाद के साथ उतना न्याय नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। उन्हें प्रायः केवल छायावादी कवि या कामायनी के रचनाकार तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका साहित्य विश्व साहित्य के महानतम रचनाकारों के समकक्ष खड़ा होता है।
उन्होंने बताया कि इसी अनुभूति ने उन्हें "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" लिखने की प्रेरणा दी। वर्ष 1991 में आरंभ हुआ यह शोधकार्य लगभग 31 वर्षों तक चलता रहा और 2022 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल आलोचना नहीं बल्कि प्रसाद के विराट व्यक्तित्व का पुनर्मूल्यांकन है। इसमें 18 प्रतिमानों के माध्यम से उनकी महानता को समझने का प्रयास किया गया है। यह प्रतिमान भगवद्गीता के 18 अध्यायों की संरचना से प्रेरित हैं।
उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य मनुष्य को निराशा से आशा की ओर, विखंडन से समन्वय की ओर और दुःख से आनंद की ओर ले जाता है। कामायनी का आनंदवाद केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं बल्कि जीवन-दृष्टि है।
उन्होंने विस्तार से बताया कि बचपन में माता-पिता और बड़े भाई की मृत्यु जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रसाद ने अपनी व्यक्तिगत वेदना को समस्त मानवता की वेदना में रूपांतरित कर दिया। यही कारण है कि उनका साहित्य निजी अनुभवों से उठकर सार्वभौमिक मानवता का साहित्य बन जाता है।
उन्होंने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी और अन्य नाटकों की चर्चा करते हुए कहा कि प्रसाद ने भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित कर राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया। उनके नाटक केवल साहित्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दस्तावेज हैं।
उन्होंने अपनी शैक्षणिक एवं साहित्यिक यात्रा का भी परिचय दिया। उनका जन्म 15 अप्रैल 1968 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे वर्तमान में मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं। उनकी कुल 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने 38 पीएच.डी. एवं 55 एम.फिल. शोधार्थियों का निर्देशन किया है।
उन्होंने अपनी प्रमुख कृतियों—जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम, हिंदी का विश्वसंदर्भ, अप्रतिम भारत, आधुनिक कविता का पुनर्पाठ, कथासाहित्य का पुनर्पाठ, मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ, पाश्चात्य काव्यचिंतन आदि का उल्लेख करते हुए हिंदी आलोचना में उनके महत्व पर प्रकाश डाला।
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प्रश्नोत्तर सत्र
सुनीता मंडल का प्रश्न
सुनीता मंडल ने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित सभी विद्वानों को सुनकर वे स्वयं को धन्य अनुभव कर रही हैं। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वे "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" पुस्तक को अपनी निजी लाइब्रेरी में अवश्य रखेंगी।
उन्होंने प्रसाद की प्रसिद्ध कविता—
"ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे..."
के संदर्भ में प्रश्न किया।
उत्तर देते हुए प्रो. उपाध्याय ने कहा कि इस कविता को पलायनवाद के रूप में देखना भूल होगी। यह कविता आत्ममंथन, आत्मशक्ति संचय और अंतर्मुखी साधना की कविता है। उन्होंने बताया कि प्रसाद का साहित्य मनुष्य को संसार से भागने नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और अधिक सशक्त होकर लौटने की प्रेरणा देता है।
विशाल मालवीय का प्रश्न
विशाल मालवीय ने प्रश्न किया कि क्या पुस्तक लिखना प्रारंभ करते समय उन्हें अनुमान था कि इस कार्य में 31 वर्ष लग जाएंगे?
उत्तर में डॉ. उपाध्याय ने कहा कि किसी भी बड़े और गंभीर कार्य के लिए समय देना पड़ता है। उन्होंने बताया कि 1991 से 2022 तक उन्होंने इस विषय पर लगातार कार्य किया। इस दौरान अध्यापन, शोध और अन्य पुस्तकों के लेखन का कार्य भी चलता रहा। उन्होंने कहा कि यदि प्रसाद को न्याय दिलाने के लिए और अधिक समय देना पड़ता तो वे वह भी देने को तैयार रहते।
अभिनव अरुण का वक्तव्य
अभिनव अरुण ने हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हिंदी का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है और साहित्य से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है कि वे हिंदी की गरिमा और शुद्धता को बनाए रखें।
इस पर प्रो. उपाध्याय ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की भी भाषा है।
वरुण सिंह गौतम का प्रश्न
वरुण सिंह गौतम ने हिंदी के भविष्य, रोजगार और अंग्रेजी की बढ़ती प्रधानता पर प्रश्न उठाया।
उत्तर में प्रो. उपाध्याय ने हिंदी की वैज्ञानिकता, देवनागरी लिपि की ध्वन्यात्मक विशेषताओं, विश्व में हिंदी भाषियों की संख्या, डिजिटल माध्यमों में हिंदी की बढ़ती उपस्थिति तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में हिंदी की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक है और आज तकनीक, शिक्षा, व्यापार तथा वैश्विक संवाद में उसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।
आप इसे कार्यवृत्त में अलग शीर्षक के रूप में जोड़ सकते हैं:
हिंदी का भविष्य : एक सार्थक विमर्श
संगोष्ठी के दौरान "क्या हिंदी का भविष्य संकट में है?" विषय पर भी गंभीर एवं विचारोत्तेजक चर्चा हुई। इस चर्चा का प्रारंभ वरुण सिंह गौतम द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा, रोजगार, तकनीकी क्षेत्र तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेज़ी को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जिसके कारण युवाओं में यह धारणा बनती जा रही है कि हिंदी का भविष्य सुरक्षित नहीं है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब अधिकांश व्यावसायिक एवं तकनीकी अवसर अंग्रेज़ी से जुड़े हैं, तब हिंदी का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
इस पर संचालक विशाल मालवीय ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हिंदी का भविष्य संकट में नहीं है। हिंदी सदैव प्रासंगिक रही है और भविष्य में भी रहेगी। उन्होंने कहा कि किसी भाषा का महत्व केवल रोजगार से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक, सामाजिक और मानवीय प्रभाव से भी निर्धारित होता है। हिंदी करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति की भाषा है और उसकी जड़ें भारतीय समाज में अत्यंत गहरी हैं।
इसके उपरांत प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल भावों की भाषा नहीं, बल्कि आज ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में भी स्थापित हो रही है। उन्होंने बताया कि देवनागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है क्योंकि इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है।
उन्होंने कहा कि विश्वभर में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते और समझते हैं तथा यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, यूट्यूब, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा डिजिटल माध्यमों में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। आज बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियाँ हिंदी में अपने उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध करा रही हैं।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि हिंदी का संकट वास्तव में हिंदी का नहीं, बल्कि हिंदी के प्रति हमारे दृष्टिकोण का संकट है। यदि साहित्यकार, शिक्षक, विद्यार्थी और समाज मिलकर हिंदी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ, तो हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी को अंग्रेज़ी की प्रतिद्वंद्वी भाषा के रूप में नहीं, बल्कि विश्व संवाद की एक सशक्त भाषा के रूप में देखना चाहिए।
चर्चा के अंत में सभी प्रतिभागियों की यह सहमति रही कि हिंदी का भविष्य संकट में नहीं है, बल्कि बदलते समय के साथ उसका स्वरूप और विस्तार दोनों बढ़ रहे हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हिंदी के प्रति आत्मविश्वास और सम्मान का भाव बनाए रखा जाए तथा नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य और भाषा से जोड़ा जाए।
इस चर्चा के दौरान अभिनव अरुण, वरुण सिंह गौतम, विशाल मालवीय एवं प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय के विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर एवं जयशंकर प्रसाद पर चर्चा
चर्चा के दौरान रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि तथा जयशंकर प्रसाद के नाटकों की तुलनात्मक समीक्षा भी की गई।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि गीतांजलि आध्यात्मिक अंतर्मुखता का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि प्रसाद के नाटक राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक जागरण और ऐतिहासिक चेतना के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य किसी भी विश्वस्तरीय साहित्यकार की रचनाओं के समकक्ष खड़ा किया जा सकता है।
आशीष अम्बर का वक्तव्य
आशीष अम्बर ने प्रसाद के नाटकों, कहानियों, उपन्यासों और काव्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि अत्यंत कम आयु में प्रसाद ने जो साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, वे हिंदी साहित्य में अद्वितीय हैं।
राष्ट्रपति से भेंट का प्रसंग
विशाल मालवीय के प्रश्न के उत्तर में प्रो. उपाध्याय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से हुई अपनी भेंट का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पुस्तक को लेकर हुई चर्चा के दौरान निर्धारित समय से कहीं अधिक समय तक वार्ता चली। राष्ट्रपति महोदया ने जयशंकर प्रसाद के साहित्य में विशेष रुचि दिखाई तथा उनके साहित्यिक योगदान के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया।
धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम के अंत में महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के अध्यक्ष अवदेश कुमार गुप्ता ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समापन
अंत में संचालक विशाल मालवीय ने सभी प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने भविष्य में भी इसी प्रकार साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता बनाए रखने का आग्रह किया।
साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के प्रति समर्पण के संकल्प के साथ कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ।
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