Saturday, 25 July 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 26 जुलाई 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

26 जुलाई 2026 (रविवार)





कार्यक्रम सारांशिका
कार्यवृत्त -

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

आयोजक संस्थाएँ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)

विषय :
"महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता"

उपविषय :
"प्रसाद का युगदृष्टा कवि-रूप : कालजयी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संदेश"

तिथि : 26 जुलाई 2026 (रविवार)
माध्यम : Google Meet (ऑनलाइन)

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी का परिचय

लिटरेचरनामा संस्थान के निदेशक विशाल मालवीय जी ने संचालन करते हुए "अरुण यह मधुमेह देश हमारा" पंक्ति का उद्बोध कियासाथ ही प्रसाद के साहित्य की विशेषता को व्याख्याित किया और सभी को साधुवाद दिया।

कार्यक्रम के क्रम  में सबसे पहले आदरणीया डॉ.पंकज वार्ष्णेय जी के द्वारा मां वीणा की वंदना प्रस्तुत की गई जो अत्यंत थी कर्णप्रिय थी।

तत्पश्चात महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संरक्षक श्री अवधेश गुप्ता जी ने सभी का स्वागत करते हुए मुख्य अतिथियों सहित सभी को साधुवाद दिया । साथी ही उन्होंने यह भी बताया कि यह कार्यक्रम धीरे-धीरे करके देश ही नहीं बल्कि विदेश में अपना पंचम लहरा रहा है। इस स्वागत भाषण में उन्होंने यह भी बताया की यह कार्यक्रम जयशंकर प्रसाद को और भी विस्तार से समझना और साहित्य पर चर्चा परिचर्चा के लिए रखा गया है।

1. श्री वीरेंद्र कुमार यादव जी ने कहा: 

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य को निश्चय ही ऊंचाइयों तक पहुंचाया है । उन्होंने प्रसाद के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए उनके संपूर्ण उपन्यासों की चर्चा की और उन्होंने कहा की कंकाल के प्रकाशन पर प्रेमचंद बहुत प्रसन्न हुए थे । इसमें सामाजिक शोषण और नारी के प्रति अमानवीय सोच की चर्चा की गई है । प्रसाद जी मानते हैं कि मानव ईश्वर से भिन्न नहीं है ।प्रसाद जी सांस्कृतिक प्रगतिशीलता की बात करते हैं उन्होंने यह भी बताया कि प्रसाद जी एक ऐसे साहित्यकार है जिन्होंने साहित्य के संपूर्ण सोच को अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया। प्रसाद जी को समझना आसान नहीं है। प्रसाद जी को जितना भी पढ़ा जाए ,उतना ही हमारा ज्ञान और बढ़ता चला जाता है।

2. डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने बताया: 

प्रसाद के बाद जो मनोविश्लेषणवादी  रचनाकार हुए उन सब ने मनोविश्लेषणवादी धारा को प्रसाद के बाद ही अपनी कहानियों में रचा। या  यूं कहे अपनी रचनाओं में स्थान दिया। प्रसाद जी  बने बनाए खांचे में अपने आप को नहीं रखते हैं, क्योंकि वह स्वयं ही एक ऐसी रचनाकार हैं जो अद्भुत और अनूठे हैं । प्रसादजी के यहां यह भी देखा जाता है कि व्यक्ति की अवचेतन मन में क्या चल रहा है। यह प्रसाद की रचनाओं की खास बात है। कथा साहित्य व्यक्ति मंथन का परिणाम है ऐसा उन्होंने बताया।

3. माननीय मधुसूदन आत्मीय जी ने कहा: 

प्रसाद जी युगदृष्टा कवि थे ।साहित्य में निहित मान्यता सार्वकालिक और सार्वभौमिक दोनों होती है ऐसा उन्होंने कहा। प्रसाद सारे कर्मों को करते हुए परमात्मा के निमित्त स्वयं को सौपा हुआ मानकर कार्य करते रहे। वह मानव धर्म को सबसे बड़ा धर्म मानते थे और मानव धर्म में मनुष्य को इसके लिए उन्हें कर्म का संदेश देते हैं। प्रसाद जी कहते हैं हमें जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी की आत्मा को कष्ट हो इसलिए ऐसा कार्य करो जिससे मानव की भलाई हो सके।

इसी क्रम में "डॉ.साहितेन्दु" जी ने प्रसाद के निधन के बाद जो उन्हें श्रद्धांजलि दी गई उसमें राज सिंह के विचारों को बताया। उन्होंने बताया कि प्रसाद जी पर मां वीणा की अद्भुत कृपा दृष्टि रही है। वे मां वीणा के वरदपुत्र रहे हैं। ऐसा लगता है कि मां वीणा उनके इशारे पर ही कार्य करती हैं ।प्रसाद जी  महासागर के समान है ,जिन्हें जान पाना और समझ पाना अत्यंत सरल कार्य नहीं है ।उन्होंन अष्टाध्याई को बचपन में ही याद कर लिया था । यह कोई साधारण बात नहीं है । दुर्गम भाव समुद्र में प्रसाद जी अपनी लेखनी के माध्यम से तैर जाते हैं , यह उन्हीं की विशेषता हो सकती है । कालिदास की भाषा के समान प्रसाद जी की भी भाषा है ऐसा भी उन्होंने बताया।

इसके पश्चात सुधा पाठक ने अपनी कविता -"हिंदी साहित्य के थे वह प्रसाद, नाम था उनका जयशंकर प्रसाद।" प्रस्तुत किया। दरभंगा से विशंभर जी ने "कितना सुंदर कितना प्यारा, भारत जो है देश हमारा।"प्रस्तुत किया । इसी के साथ ही दर्शन की प्रोफेसर समांथा द्विवेदीने बताया की कविता में कुछ न कुछ जरूर रहता है ।साथी उन्होंने प्रसाद जी की समरसता भाव को अपने व्याख्या में व्याख्यायित किया। इसके पश्चात जूही झा ने कविता - "हे मातृ भूमि, हे भारत माता।
जूही झा अद्भुत कविता पाठ किया लेकर आओ कोई अवतार। प्रस्तुत किया।
आशीष अम्बर ने देशभक्ति पर बहुत सुंदर कविता पाठ की ,

अंत में डॉ.कविता प्रसाद जी ने कार्यक्रम की भूरि भूरि  प्रशंसा करते हुए धन्यवाद ज्ञापित करते हुए यह भी बताया कि इस कार्यक्रम को होते हुए लगभग दो महीने पूरे हो गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यह कार्यक्रम यूट्यूब और फेसबुक पर लाइक भी प्रसारित होता रहता है। इन महत्वपूर्ण जानकारी से सभी को अवगत कराया। और लोगों से निवेदन किया कि आप कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़ते रहें।


जुड़े लोग-

अमृता राव, प्रीति त्रिपाठी, वीरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. शिप्रा मिश्रा, डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय "साहित्सुधी", जूही झा, महालक्ष्मी कुशरी, रुक्मणी राय, सच्चिदानन्द साह, समर्थ द्विवेदी, संतोष के. बरनवाल, शुभम कुमारी मिश्रा, शुभम सिंह, स्मृति पाठक, वरुण कुमार गौतम, राजश्री तावरे, आशीष अम्बर, आनंद वर्मा, सीमा कुशवाहा, ज्योत्स्ना श्रीवास्तव, हिन्दी भाषा, के.के. एम.एम. (नाम स्पष्ट नहीं), डॉ. आशुतोष शास्त्री, गीता सहारिया, रत्ना यादव, राजवीर सिंह (अंतिम शब्द स्पष्ट नहीं) तथा डॉ. चन्द्रभान यादव।
@all




Sunday, 19 July 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 19 जुलाई 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

19 जुलाई 2026 (रविवार)




कार्यवृत्त -

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

आयोजक संस्थाएँ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)

विषय :
"महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता"

उपविषय :
"प्रसाद का युगदृष्टा कवि-रूप : कालजयी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संदेश"

तिथि : 19 जुलाई 2026 (रविवार)
माध्यम : Google Meet (ऑनलाइन)

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी का परिचय

महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी अत्यंत गरिमामय, ज्ञानवर्धक एवं साहित्यिक वातावरण में सम्पन्न हुई। कार्यक्रम का उद्देश्य महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में निहित राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता, मानवीय मूल्यों तथा उनके युगदृष्टा व्यक्तित्व के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श करना था।

देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े विद्वान साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, कवियों एवं साहित्यप्रेमियों ने इस आयोजन में सहभागिता कर अपने विचारों एवं रचनाओं के माध्यम से कार्यक्रम को सार्थक बनाया। संगोष्ठी में महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन पर गंभीर चर्चा हुई। इसके उपरांत आयोजित काव्य गोष्ठी ने साहित्यिक वातावरण को और अधिक जीवंत एवं भावपूर्ण बना दिया।

संचालन

 श्री विशाल मालवीय 
संपादक-निर्देशक लिटरेचरनामा संस्थान एवं संचालक, महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट

संपूर्ण कार्यक्रम का प्रभावशाली, गरिमामय एवं विद्वत्तापूर्ण संचालन श्री विशाल मालवीय ने किया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद की ओजस्वी पंक्तियों के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए प्रसाद साहित्य की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी अतिथियों का परिचय कराया तथा पूरे कार्यक्रम को अत्यंत संयम, शालीनता और साहित्यिक गरिमा के साथ सफलतापूर्वक संचालित किया।


 माँ सरस्वती वंदना 
 
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. शिप्रा मिश्रा (पूर्वी चंपारण, बिहार) द्वारा प्रस्तुत माँ सरस्वती की वंदना "माता सरस्वती शारदा..." से हुआ। उनके मधुर, भावपूर्ण एवं सुरमय गायन ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक, ज्ञानमय एवं साहित्यिक ऊर्जा से आलोकित कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम के लिए अत्यंत पावन एवं प्रेरणादायी वातावरण निर्मित किया।


स्वागत वक्तव्य

 श्री अवधेश कुमार गुप्ता - न्यासी, महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट 

माँ सरस्वती की वंदना के उपरांत श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने सभी मुख्य अतिथियों, विशिष्ट वक्ताओं, साहित्यकारों, शोधार्थियों, कवियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं देशभर से जुड़े साहित्यप्रेमियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया।

उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना के उद्देश्य एवं उसकी साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ट्रस्ट का मूल ध्येय महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य, राष्ट्रीय चिंतन एवं सांस्कृतिक दर्शन का व्यापक प्रचार-प्रसार करना है। उन्होंने संगोष्ठियों एवं साहित्यिक आयोजनों की आवश्यकता पर बल देते हुए सभी साहित्यप्रेमियों से ऐसे आयोजनों में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया।

मुख्य वक्ताओं के विचार

 प्रथम मुख्य अतिथि – श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना 

श्री विशाल मालवीय ने अपने कुशल एवं प्रभावी संचालन के क्रम में प्रथम मुख्य अतिथि श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना को आमंत्रित किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद केवल छायावाद के प्रमुख स्तंभ ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों के समर्थ व्याख्याता भी थे। उनके साहित्य में भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन, मानवीय संवेदनाओं तथा राष्ट्रप्रेम का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी की रचनाएँ समय की सीमाओं से परे जाकर प्रत्येक पीढ़ी को नई दिशा और प्रेरणा प्रदान करती हैं तथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने रचनाकाल में थीं। अपने वक्तव्य के उपरांत उन्होंने अपनी स्वरचित भावपूर्ण कविता "जीना क्या होता है जाना, मैंने तुमको पाकर" का सस्वर पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

 द्वितीय मुख्य वक्ता – डॉ. आशुतोष शास्त्री 

द्वितीय मुख्य वक्ता डॉ. आशुतोष शास्त्री ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी ने किसी औपचारिक विश्वविद्यालयी शिक्षा के बल पर नहीं, बल्कि सतत स्वाध्याय, अनुशासन और ज्ञान-पिपासा के माध्यम से अद्वितीय विद्वत्ता अर्जित की। उन्होंने संस्कृत, हिंदी, इतिहास, दर्शन तथा भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन कर अपने साहित्य को असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज लाखों रुपये व्यय करने के बावजूद विद्यार्थियों में भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति अपेक्षित अनुराग विकसित नहीं हो पा रहा है, जबकि प्रसाद जी ने अल्पायु में ही अपनी प्रतिभा और साधना के बल पर हिंदी साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि महाकवि प्रसाद का साहित्य केवल सौंदर्यबोध का साहित्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों का सशक्त दस्तावेज है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके जागरूक, संस्कारित और उत्तरदायी नागरिक होते हैं, और प्रसाद का साहित्य हमें यही प्रेरणा देता है।

 तृतीय मुख्य वक्ता – डॉ. महालक्ष्मी केशरी 

तृतीय मुख्य वक्ता डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने अपने अत्यंत आत्मीय एवं शोधपरक वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन, परिवार और साहित्यिक परंपरा के अनेक महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से श्रोताओं को परिचित कराया। उन्होंने बताया कि उनका प्रसाद परिवार से लगभग 26 वर्षों का घनिष्ठ एवं पारिवारिक संबंध रहा है, जिसके कारण उन्हें इस साहित्यिक विरासत को निकट से जानने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ।
उन्होंने बताया कि सत्र 2005–2006 में उन्हें इंदु पत्रिका के प्रूफरीडिंग कार्य से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिससे वे प्रसाद परिवार की साहित्यिक गतिविधियों से और अधिक निकटता से जुड़ीं। उन्होंने कहा कि महाकवि प्रसाद के पुत्र रत्नशंकर जी के पश्चात उनके तृतीय पौत्र श्री आनंद शंकर जी इस अमूल्य साहित्यिक धरोहर के संरक्षण एवं संवर्धन में निरंतर योगदान दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में डॉ. कविता प्रसाद तथा उनके पति श्री अवधेश कुमार गुप्ता महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अत्यंत समर्पण और निष्ठा के साथ कार्य कर रहे हैं। अपने वक्तव्य के समापन पर उन्होंने महाकवि प्रसाद की कालजयी कविता "हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती…" का ओजपूर्ण एवं सस्वर पाठ किया, जिससे समूचा वातावरण राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और साहित्यिक ऊर्जा से अनुप्राणित हो उठा।

 चतुर्थ मुख्य वक्ता – डॉ. कामाख्या नारायण 

इसके उपरांत भारत सरकार के उपनिदेशक एवं विशिष्ट चिंतक डॉ. कामाख्या नारायण ने अपने गहन दार्शनिक एवं चिंतनपरक वक्तव्य में कहा कि संपूर्ण सृष्टि माया से आच्छादित है और उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन साधना का विषय है। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद को मूलतः एक ऐसे महाकवि के रूप में स्मरण किया, जिन्होंने मानव के बाह्य जीवन के साथ-साथ उसके अंतर्जगत की भी गहन पड़ताल की है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में प्रत्येक व्यक्ति दूसरों को सुधारने में अधिक रुचि रखता है, जबकि वास्तविक परिवर्तन आत्मचिंतन, आत्मानुशासन और आत्मपरिष्कार से ही संभव है। उन्होंने समकालीन वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज मानव के अंतर्मन का सूखना ही अधिकांश सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संकटों का मूल कारण बन गया है। प्रसाद का साहित्य हमें अपने भीतर झाँकने, आत्मबोध प्राप्त करने तथा मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संदेश देता है। उनके विचारों ने उपस्थित श्रोताओं को गहन आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।

काव्य गोष्ठी

साहित्यिक संगोष्ठी के उपरांत आयोजित काव्य गोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े कवियों एवं साहित्यकारों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया।

श्री सच्चिदानंद साह (भागलपुर) — "सुन लेंगे आपकी मन की बातें..." गीत।

डॉ. पंकज वासनी — प्रेम एवं संवेदना से परिपूर्ण कविता।

श्रीमती मीनू शर्मा — महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति "आँसू" का प्रभावशाली वाचन।

आर. सी. तंवर — "झूम-झूम कर आया सावन..."।

श्री राजेश सिंह — महाकवि प्रसाद को श्रद्धांजलि।

श्री ओम जी — "प्रसाद छोटे से बड़े तक"।

माननीय संजय जी — प्रसाद जी को समर्पित काव्य प्रस्तुति।

डॉ. सुशीला जी — "बचपन बीता, यौवन बीता..."।

प्रो. वत्सला श्रीवास्तव — मातृत्व पर आधारित अत्यंत मार्मिक कविता।

श्री राजेंद्र नारायण शर्मा — महाकवि प्रसाद से जुड़े प्रेरक संस्मरण।

श्री मोहित कुमार शर्मा (छत्तीसगढ़) — "बेटी की पुकार" का भावपूर्ण पाठ।


सभी कवियों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को भावनात्मक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया।



समापन

कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. कविता प्रसाद गुप्ता ने संपूर्ण संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना एवं मानवीय मूल्यों की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया तथा सभी प्रतिभागियों को साहित्य-साधना के प्रति निरंतर समर्पित रहने का संदेश दिया।


धन्यवाद ज्ञापन

 डॉ. कविता प्रसाद जी 

 सभी मुख्य अतिथियों, विशिष्ट वक्ताओं, साहित्यकारों, कवियों, शोधार्थियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, प्रतिभागियों तथा आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त प्रयासों की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे आयोजन भविष्य में भी साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, 
इच्छा पूरी क्यों हो मन की? 
एक दूसरे से मिल न सकें,
 यह विडंबना है जीवन की। प्रसाद की पंक्तियों के साथ उन्होंने इस मधुरम संगोष्ठी औपचारिक रूप से समापन किया धन्यवाद 

प्रथम पैराग्राफ उपस्थित संख्या

 1. अनिता रॉय, 2. अरुंधति रॉय विश्वास, 3. डॉ. शिप्रा मिश्रा, 4. डॉ. आशुतोष शास्त्री, 5. डॉ. सुशीला ओझा, 6. डॉ. राजश्री तंवर, 7. मधुसूदन, 8. डॉ. महालक्ष्मी केशरी, 9. पवन कुमार शास्त्री, 10. सरिता श्रीवास्तव, 11. सुभाष सक्सेना, 12. पंकज अस्तिनी, 13. सच्चिदानंद साह, 14. कवि शिवम श्रीवास्तव, 15. डॉ. कामाख्या नारायण, 16. सोनिया श्रीवास्तव, 17. शुभंकर बाबू, 18. आनंद वर्मा, 19. जगदीप चंद्रा, 20. राजेश कुमार सिंह, 21. प्रज्ञा सिंह, 22. समिता शर्मा, 23. संजय सैनी, 24. मीनू शर्मा, 25. प्रकाश मुंज, 26. रश्मी कुशवाह, 27. डॉ. ओम सिंह, 28. अनन्या (डॉ. ओम), 29. आशीष अंबर, 30. डॉ. विभा पारीक, 31. वत्सला श्रीवास्तव, 32. ब्रजेश यादव, 33. अनम, 34. अभिनव अरुण, 35. रश्मी, 36. शाइन, 37. तनु पांडे, 38. डॉ. शुशीला केशरी, 39. छाया शाह, 40. मोहित कुमार शर्मा, 41. सीमा कुशवाह, 42. सुनील यशवन्त व्यास


कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियाँ

महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर गंभीर एवं सारगर्भित राष्ट्रीय विमर्श।

राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता एवं भारतीय जीवन-दर्शन पर विचारोत्तेजक व्याख्यान।

देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता।

गीत, कविता, काव्य-पाठ एवं साहित्यिक संवाद की उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ।

साहित्य, संस्कृति एवं राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक सफल एवं प्रेरणादायी आयोजन।




Sunday, 12 July 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 12 जुलाई 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

12 जुलाई 2026 (रविवार)



📢 संगोष्ठी हेतु महत्वपूर्ण सूचना 

अत्यंत दुःख के साथ सूचित किया जाता है कि महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के न्यासी श्री अवधेश कुमार गुप्ता जी की पूजनीय बड़ी माँ का आकस्मिक निधन हो गया है।

इस परिस्थिति के कारण 12 जुलाई 2026 को आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी को स्थगित किया जाता है।

अब यह कार्यक्रम 19 जुलाई 2026 (रविवार) को पूर्व निर्धारित समय पर आयोजित होगा। संगोष्ठी का विषय, मुख्य अतिथि, सभी वक्ता एवं कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा यथावत रहेगी। केवल तिथि में परिवर्तन किया गया है।

इस आकस्मिक परिवर्तन से हुई असुविधा के लिए हम हृदय से क्षमाप्रार्थी हैं। आशा है कि आप सभी साहित्य-प्रेमी इस परिस्थिति को समझते हुए अपना सहयोग एवं स्नेह बनाए रखेंगे।

आयोजन समिति
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान 🙏

Sunday, 5 July 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 05 जुलाई 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

05 जुलाई 2026 (रविवार)






कार्यवृत्त 

अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

आयोजक: महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान
विषय: "जयशंकर प्रसाद का समग्र साहित्य : नए विमर्श और वैश्विक संदर्भ"
उपविषय: "भारत और विश्व के साहित्यिक संवाद की एक साझा पहल"
तिथि: 05 जुलाई 2026 (रविवार)
समय: संगोष्ठी – सायं 4:00 से 5:00 बजे तक | काव्य गोष्ठी – सायं 5:00 से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet


कार्यक्रम संचालन एवं प्रारंभ

कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन वरुण सिंह गौतम (उप-संपादक, लिटरेचरनामा संस्थान) ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रियंका पुरोहित द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण एवं भक्तिमय सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक एवं साहित्यिक गरिमा प्रदान की।

इसके उपरांत अवधेश कुमार गुप्ता ने स्वागत वक्तव्य देते हुए सभी देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, संस्कारों और सांस्कृतिक चेतना का संवाहक है तथा समाज को दिशा देने वाली सशक्त शक्ति है।

धन्यवाद ज्ञापन विशाल मालवीय द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने सभी मुख्य वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आयोजन की सफलता का श्रेय सभी सहभागी साहित्यकारों को दिया।


मुख्य वक्ताओं के व्याख्यान

1. डॉ. रितु शर्मा (नीदरलैंड)

नीदरलैंड की प्रवासी साहित्यकार एवं मुख्य वक्ता डॉ. रितु शर्मा ने "जयशंकर प्रसाद का समग्र साहित्य : नए विमर्श और वैश्विक संदर्भ" विषय पर अत्यंत प्रभावशाली व्याख्यान दिया। उन्होंने प्रसाद साहित्य को भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का वैश्विक प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन-दृष्टि, प्रकृति का मानवीकरण, आध्यात्मिक चेतना तथा मानवीय मूल्यों का अद्भुत समन्वय मिलता है। उन्होंने कामायनी के दार्शनिक पक्ष, भारतीय चिंतन, पश्चिमी पुनर्जागरण तथा आधुनिक वैश्विक संदर्भों के आलोक में प्रसाद साहित्य की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

2. डॉ. कविन्द्र नारायण

डॉ. कविन्द्र नारायण ने तुलनात्मक साहित्यिक दृष्टि से जयशंकर प्रसाद के बहुआयामी साहित्य का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद केवल एक कवि नहीं, बल्कि कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास और निबंध जैसी विविध विधाओं के अप्रतिम सर्जक हैं। उन्होंने प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों, राष्ट्रीय चेतना, वैदिक संस्कृति, वसुधैव कुटुम्बकम्, ज्ञान-इच्छा-कर्म के समन्वय तथा कामायनी को मानव-मन की विराट आध्यात्मिक यात्रा बताते हुए उन्हें आधुनिक भारतीय साहित्य का युगप्रवर्तक साहित्यकार निरूपित किया।

3. डॉ. दिनेश दास

पर्यावरणविद् डॉ. दिनेश दास ने प्रसाद साहित्य में निहित पर्यावरण चेतना, प्रकृति के मानवीकरण तथा मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि जयशंकर प्रसाद का साहित्य वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संतुलन तथा मानवीय संवेदनशीलता के लिए प्रेरणादायी मार्गदर्शक है और उनकी रचनाएँ आज भी पर्यावरणीय विमर्श को नई दिशा प्रदान करती हैं।

4. कामाख्या नारायण सिंह

कामाख्या नारायण सिंह ने जयशंकर प्रसाद के साहित्य में भाषा, दर्शन, राष्ट्रचेतना, विज्ञान-दृष्टि तथा ऐतिहासिक बोध का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रसाद की रचनाओं के माध्यम से महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चाणक्य, चंद्रगुप्त तथा दिनकर जैसे महापुरुषों के विचारों से उनके साहित्यिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय मूल्यों का सशक्त दस्तावेज है।


अन्य वक्ताओं एवं प्रस्तुतकर्ताओं की सहभागिता

इसके उपरांत डॉ. अनन्य, मणिशंकर दुबे, मुस्कान कश्यप, डॉ. शिप्रा मिश्रा, रमेश चंद्र गौतम, सुशील कुमार 'साहित्यइंदु', भव्य वर्मा, मधुमति जोशी, डॉ. पंकज वर्मा, दिलशाद बेगम तथा वैश्विनी ने अपने विचार, काव्य-पाठ, गीत एवं साहित्यिक प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को समृद्ध बनाया।

प्रतिभागियों की सहभागिता

संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी में कुल 43 साहित्यकारों, विद्वानों, शोधार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।

उपस्थित प्रतिभागियों के नाम निम्नलिखित हैं

अनंदी शिंदे, बाविता वर्मा, देव घोष, डॉ. ओम सिंह (अनन्या), डॉ. रितु शर्मा, दिलशाद बेगम, निकेश कुमार, डॉ. सुशील कुमार पांडेय, गीता पांडेय, हिमांशु त्रिपाठी, कामाख्या नारायण सिंह, डॉ. कविन्द्र नारायण, प्रियंका पुरोहित, मधुसूदन, ममता सिंह, डॉ. दिनेश दास, रमेश चंद्र गौतम, स्वर्णिमाबिंदु लोला, डॉ. राममणि शंकर दुबे, विशाल मालवीय, रीना सोपाम, रूबी सिंह, जलदूत किशोर, डॉ. शिप्रा मिश्रा, बृजेश यादव, निकेश कुमार, गर्ग मैडम, विवेक वर्मा, वरुण सिंह गौतम, आकाश राघव, विजय पाटिल, सुनीता शर्मा, सैंड्रा लोएटावान, मधुमति विजय जोशी, आशीष अंबर, के. सी. मेहता, दया एस. यादव, डॉ. पंकज वर्मा, कृष्ण आर्या, अपेक्षा, हर्ष, कृष्ण राम चौहान एवं पुष्पा जी।

निष्कर्ष

संगोष्ठी में उपस्थित सभी विद्वानों एवं साहित्यप्रेमियों ने एक स्वर से कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता, मानवीय संवेदना तथा वैश्विक दृष्टि की अमूल्य धरोहर है। सभी ने उनके साहित्य के व्यापक अध्ययन, शोध एवं प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल देते हुए ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को निरंतर आयोजित किए जाने की अपेक्षा व्यक्त की।

यह आयोजन साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत सफल, सार्थक एवं ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ।




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