कार्यवृत्त -
राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी
आयोजक संस्थाएँ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)
विषय :
"महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता"
उपविषय :
"प्रसाद का युगदृष्टा कवि-रूप : कालजयी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संदेश"
तिथि : 19 जुलाई 2026 (रविवार)
माध्यम : Google Meet (ऑनलाइन)
राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी का परिचय
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी अत्यंत गरिमामय, ज्ञानवर्धक एवं साहित्यिक वातावरण में सम्पन्न हुई। कार्यक्रम का उद्देश्य महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में निहित राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता, मानवीय मूल्यों तथा उनके युगदृष्टा व्यक्तित्व के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श करना था।
देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े विद्वान साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, कवियों एवं साहित्यप्रेमियों ने इस आयोजन में सहभागिता कर अपने विचारों एवं रचनाओं के माध्यम से कार्यक्रम को सार्थक बनाया। संगोष्ठी में महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन पर गंभीर चर्चा हुई। इसके उपरांत आयोजित काव्य गोष्ठी ने साहित्यिक वातावरण को और अधिक जीवंत एवं भावपूर्ण बना दिया।
संचालन
श्री विशाल मालवीय
संपादक-निर्देशक लिटरेचरनामा संस्थान एवं संचालक, महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट
संपूर्ण कार्यक्रम का प्रभावशाली, गरिमामय एवं विद्वत्तापूर्ण संचालन श्री विशाल मालवीय ने किया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद की ओजस्वी पंक्तियों के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए प्रसाद साहित्य की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी अतिथियों का परिचय कराया तथा पूरे कार्यक्रम को अत्यंत संयम, शालीनता और साहित्यिक गरिमा के साथ सफलतापूर्वक संचालित किया।
माँ सरस्वती वंदना
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. शिप्रा मिश्रा (पूर्वी चंपारण, बिहार) द्वारा प्रस्तुत माँ सरस्वती की वंदना "माता सरस्वती शारदा..." से हुआ। उनके मधुर, भावपूर्ण एवं सुरमय गायन ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक, ज्ञानमय एवं साहित्यिक ऊर्जा से आलोकित कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम के लिए अत्यंत पावन एवं प्रेरणादायी वातावरण निर्मित किया।
स्वागत वक्तव्य
श्री अवधेश कुमार गुप्ता - न्यासी, महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट
माँ सरस्वती की वंदना के उपरांत श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने सभी मुख्य अतिथियों, विशिष्ट वक्ताओं, साहित्यकारों, शोधार्थियों, कवियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं देशभर से जुड़े साहित्यप्रेमियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया।
उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना के उद्देश्य एवं उसकी साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ट्रस्ट का मूल ध्येय महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य, राष्ट्रीय चिंतन एवं सांस्कृतिक दर्शन का व्यापक प्रचार-प्रसार करना है। उन्होंने संगोष्ठियों एवं साहित्यिक आयोजनों की आवश्यकता पर बल देते हुए सभी साहित्यप्रेमियों से ऐसे आयोजनों में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया।
मुख्य वक्ताओं के विचार
प्रथम मुख्य अतिथि – श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना
श्री विशाल मालवीय ने अपने कुशल एवं प्रभावी संचालन के क्रम में प्रथम मुख्य अतिथि श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना को आमंत्रित किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद केवल छायावाद के प्रमुख स्तंभ ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों के समर्थ व्याख्याता भी थे। उनके साहित्य में भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन, मानवीय संवेदनाओं तथा राष्ट्रप्रेम का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी की रचनाएँ समय की सीमाओं से परे जाकर प्रत्येक पीढ़ी को नई दिशा और प्रेरणा प्रदान करती हैं तथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने रचनाकाल में थीं। अपने वक्तव्य के उपरांत उन्होंने अपनी स्वरचित भावपूर्ण कविता "जीना क्या होता है जाना, मैंने तुमको पाकर" का सस्वर पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
द्वितीय मुख्य वक्ता – डॉ. आशुतोष शास्त्री
द्वितीय मुख्य वक्ता डॉ. आशुतोष शास्त्री ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी ने किसी औपचारिक विश्वविद्यालयी शिक्षा के बल पर नहीं, बल्कि सतत स्वाध्याय, अनुशासन और ज्ञान-पिपासा के माध्यम से अद्वितीय विद्वत्ता अर्जित की। उन्होंने संस्कृत, हिंदी, इतिहास, दर्शन तथा भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन कर अपने साहित्य को असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज लाखों रुपये व्यय करने के बावजूद विद्यार्थियों में भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति अपेक्षित अनुराग विकसित नहीं हो पा रहा है, जबकि प्रसाद जी ने अल्पायु में ही अपनी प्रतिभा और साधना के बल पर हिंदी साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि महाकवि प्रसाद का साहित्य केवल सौंदर्यबोध का साहित्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों का सशक्त दस्तावेज है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके जागरूक, संस्कारित और उत्तरदायी नागरिक होते हैं, और प्रसाद का साहित्य हमें यही प्रेरणा देता है।
तृतीय मुख्य वक्ता – डॉ. महालक्ष्मी केशरी
तृतीय मुख्य वक्ता डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने अपने अत्यंत आत्मीय एवं शोधपरक वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन, परिवार और साहित्यिक परंपरा के अनेक महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से श्रोताओं को परिचित कराया। उन्होंने बताया कि उनका प्रसाद परिवार से लगभग 26 वर्षों का घनिष्ठ एवं पारिवारिक संबंध रहा है, जिसके कारण उन्हें इस साहित्यिक विरासत को निकट से जानने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ।
उन्होंने बताया कि सत्र 2005–2006 में उन्हें इंदु पत्रिका के प्रूफरीडिंग कार्य से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिससे वे प्रसाद परिवार की साहित्यिक गतिविधियों से और अधिक निकटता से जुड़ीं। उन्होंने कहा कि महाकवि प्रसाद के पुत्र रत्नशंकर जी के पश्चात उनके तृतीय पौत्र श्री आनंद शंकर जी इस अमूल्य साहित्यिक धरोहर के संरक्षण एवं संवर्धन में निरंतर योगदान दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में डॉ. कविता प्रसाद तथा उनके पति श्री अवधेश कुमार गुप्ता महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अत्यंत समर्पण और निष्ठा के साथ कार्य कर रहे हैं। अपने वक्तव्य के समापन पर उन्होंने महाकवि प्रसाद की कालजयी कविता "हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती…" का ओजपूर्ण एवं सस्वर पाठ किया, जिससे समूचा वातावरण राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और साहित्यिक ऊर्जा से अनुप्राणित हो उठा।
चतुर्थ मुख्य वक्ता – डॉ. कामाख्या नारायण
इसके उपरांत भारत सरकार के उपनिदेशक एवं विशिष्ट चिंतक डॉ. कामाख्या नारायण ने अपने गहन दार्शनिक एवं चिंतनपरक वक्तव्य में कहा कि संपूर्ण सृष्टि माया से आच्छादित है और उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन साधना का विषय है। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद को मूलतः एक ऐसे महाकवि के रूप में स्मरण किया, जिन्होंने मानव के बाह्य जीवन के साथ-साथ उसके अंतर्जगत की भी गहन पड़ताल की है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में प्रत्येक व्यक्ति दूसरों को सुधारने में अधिक रुचि रखता है, जबकि वास्तविक परिवर्तन आत्मचिंतन, आत्मानुशासन और आत्मपरिष्कार से ही संभव है। उन्होंने समकालीन वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज मानव के अंतर्मन का सूखना ही अधिकांश सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संकटों का मूल कारण बन गया है। प्रसाद का साहित्य हमें अपने भीतर झाँकने, आत्मबोध प्राप्त करने तथा मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संदेश देता है। उनके विचारों ने उपस्थित श्रोताओं को गहन आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।
काव्य गोष्ठी
साहित्यिक संगोष्ठी के उपरांत आयोजित काव्य गोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े कवियों एवं साहित्यकारों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया।
श्री सच्चिदानंद साह (भागलपुर) — "सुन लेंगे आपकी मन की बातें..." गीत।
डॉ. पंकज वासनी — प्रेम एवं संवेदना से परिपूर्ण कविता।
श्रीमती मीनू शर्मा — महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति "आँसू" का प्रभावशाली वाचन।
आर. सी. तंवर — "झूम-झूम कर आया सावन..."।
श्री राजेश सिंह — महाकवि प्रसाद को श्रद्धांजलि।
श्री ओम जी — "प्रसाद छोटे से बड़े तक"।
माननीय संजय जी — प्रसाद जी को समर्पित काव्य प्रस्तुति।
डॉ. सुशीला जी — "बचपन बीता, यौवन बीता..."।
प्रो. वत्सला श्रीवास्तव — मातृत्व पर आधारित अत्यंत मार्मिक कविता।
श्री राजेंद्र नारायण शर्मा — महाकवि प्रसाद से जुड़े प्रेरक संस्मरण।
श्री मोहित कुमार शर्मा (छत्तीसगढ़) — "बेटी की पुकार" का भावपूर्ण पाठ।
सभी कवियों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को भावनात्मक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
समापन
कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. कविता प्रसाद गुप्ता ने संपूर्ण संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना एवं मानवीय मूल्यों की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया तथा सभी प्रतिभागियों को साहित्य-साधना के प्रति निरंतर समर्पित रहने का संदेश दिया।
धन्यवाद ज्ञापन
डॉ. कविता प्रसाद जी
सभी मुख्य अतिथियों, विशिष्ट वक्ताओं, साहित्यकारों, कवियों, शोधार्थियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, प्रतिभागियों तथा आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त प्रयासों की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे आयोजन भविष्य में भी साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ।
ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है,
इच्छा पूरी क्यों हो मन की?
एक दूसरे से मिल न सकें,
यह विडंबना है जीवन की। प्रसाद की पंक्तियों के साथ उन्होंने इस मधुरम संगोष्ठी औपचारिक रूप से समापन किया धन्यवाद
प्रथम पैराग्राफ उपस्थित संख्या
1. अनिता रॉय, 2. अरुंधति रॉय विश्वास, 3. डॉ. शिप्रा मिश्रा, 4. डॉ. आशुतोष शास्त्री, 5. डॉ. सुशीला ओझा, 6. डॉ. राजश्री तंवर, 7. मधुसूदन, 8. डॉ. महालक्ष्मी केशरी, 9. पवन कुमार शास्त्री, 10. सरिता श्रीवास्तव, 11. सुभाष सक्सेना, 12. पंकज अस्तिनी, 13. सच्चिदानंद साह, 14. कवि शिवम श्रीवास्तव, 15. डॉ. कामाख्या नारायण, 16. सोनिया श्रीवास्तव, 17. शुभंकर बाबू, 18. आनंद वर्मा, 19. जगदीप चंद्रा, 20. राजेश कुमार सिंह, 21. प्रज्ञा सिंह, 22. समिता शर्मा, 23. संजय सैनी, 24. मीनू शर्मा, 25. प्रकाश मुंज, 26. रश्मी कुशवाह, 27. डॉ. ओम सिंह, 28. अनन्या (डॉ. ओम), 29. आशीष अंबर, 30. डॉ. विभा पारीक, 31. वत्सला श्रीवास्तव, 32. ब्रजेश यादव, 33. अनम, 34. अभिनव अरुण, 35. रश्मी, 36. शाइन, 37. तनु पांडे, 38. डॉ. शुशीला केशरी, 39. छाया शाह, 40. मोहित कुमार शर्मा, 41. सीमा कुशवाह, 42. सुनील यशवन्त व्यास
कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियाँ
महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर गंभीर एवं सारगर्भित राष्ट्रीय विमर्श।
राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता एवं भारतीय जीवन-दर्शन पर विचारोत्तेजक व्याख्यान।
देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता।
गीत, कविता, काव्य-पाठ एवं साहित्यिक संवाद की उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ।
साहित्य, संस्कृति एवं राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक सफल एवं प्रेरणादायी आयोजन।