Saturday, 25 July 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 26 जुलाई 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

26 जुलाई 2026 (रविवार)






कार्यक्रम सारांशिका
कार्यवृत्त -

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

आयोजक संस्थाएँ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)

विषय :
"महाकवि जयशंकर प्रसाद के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता"

उपविषय :
"प्रसाद का युगदृष्टा कवि-रूप : कालजयी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संदेश"

तिथि : 26 जुलाई 2026 (रविवार)
माध्यम : Google Meet (ऑनलाइन)

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी का परिचय

लिटरेचरनामा संस्थान के निदेशक विशाल मालवीय जी ने संचालन करते हुए "अरुण यह मधुमेह देश हमारा" पंक्ति का उद्बोध कियासाथ ही प्रसाद के साहित्य की विशेषता को व्याख्याित किया और सभी को साधुवाद दिया।

कार्यक्रम के क्रम  में सबसे पहले आदरणीया डॉ.पंकज वार्ष्णेय जी के द्वारा मां वीणा की वंदना प्रस्तुत की गई जो अत्यंत थी कर्णप्रिय थी।

तत्पश्चात महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संरक्षक श्री अवधेश गुप्ता जी ने सभी का स्वागत करते हुए मुख्य अतिथियों सहित सभी को साधुवाद दिया । साथी ही उन्होंने यह भी बताया कि यह कार्यक्रम धीरे-धीरे करके देश ही नहीं बल्कि विदेश में अपना पंचम लहरा रहा है। इस स्वागत भाषण में उन्होंने यह भी बताया की यह कार्यक्रम जयशंकर प्रसाद को और भी विस्तार से समझना और साहित्य पर चर्चा परिचर्चा के लिए रखा गया है।

1. श्री वीरेंद्र कुमार यादव जी ने कहा: 

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य को निश्चय ही ऊंचाइयों तक पहुंचाया है । उन्होंने प्रसाद के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए उनके संपूर्ण उपन्यासों की चर्चा की और उन्होंने कहा की कंकाल के प्रकाशन पर प्रेमचंद बहुत प्रसन्न हुए थे । इसमें सामाजिक शोषण और नारी के प्रति अमानवीय सोच की चर्चा की गई है । प्रसाद जी मानते हैं कि मानव ईश्वर से भिन्न नहीं है ।प्रसाद जी सांस्कृतिक प्रगतिशीलता की बात करते हैं उन्होंने यह भी बताया कि प्रसाद जी एक ऐसे साहित्यकार है जिन्होंने साहित्य के संपूर्ण सोच को अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया। प्रसाद जी को समझना आसान नहीं है। प्रसाद जी को जितना भी पढ़ा जाए ,उतना ही हमारा ज्ञान और बढ़ता चला जाता है।

2. डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने बताया: 

प्रसाद के बाद जो मनोविश्लेषणवादी  रचनाकार हुए उन सब ने मनोविश्लेषणवादी धारा को प्रसाद के बाद ही अपनी कहानियों में रचा। या  यूं कहे अपनी रचनाओं में स्थान दिया। प्रसाद जी  बने बनाए खांचे में अपने आप को नहीं रखते हैं, क्योंकि वह स्वयं ही एक ऐसी रचनाकार हैं जो अद्भुत और अनूठे हैं । प्रसादजी के यहां यह भी देखा जाता है कि व्यक्ति की अवचेतन मन में क्या चल रहा है। यह प्रसाद की रचनाओं की खास बात है। कथा साहित्य व्यक्ति मंथन का परिणाम है ऐसा उन्होंने बताया।

3. माननीय मधुसूदन आत्मीय जी ने कहा: 

प्रसाद जी युगदृष्टा कवि थे ।साहित्य में निहित मान्यता सार्वकालिक और सार्वभौमिक दोनों होती है ऐसा उन्होंने कहा। प्रसाद सारे कर्मों को करते हुए परमात्मा के निमित्त स्वयं को सौपा हुआ मानकर कार्य करते रहे। वह मानव धर्म को सबसे बड़ा धर्म मानते थे और मानव धर्म में मनुष्य को इसके लिए उन्हें कर्म का संदेश देते हैं। प्रसाद जी कहते हैं हमें जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी की आत्मा को कष्ट हो इसलिए ऐसा कार्य करो जिससे मानव की भलाई हो सके।

इसी क्रम में "डॉ.साहितेन्दु" जी ने प्रसाद के निधन के बाद जो उन्हें श्रद्धांजलि दी गई उसमें राज सिंह के विचारों को बताया। उन्होंने बताया कि प्रसाद जी पर मां वीणा की अद्भुत कृपा दृष्टि रही है। वे मां वीणा के वरदपुत्र रहे हैं। ऐसा लगता है कि मां वीणा उनके इशारे पर ही कार्य करती हैं ।प्रसाद जी  महासागर के समान है ,जिन्हें जान पाना और समझ पाना अत्यंत सरल कार्य नहीं है ।उन्होंन अष्टाध्याई को बचपन में ही याद कर लिया था । यह कोई साधारण बात नहीं है । दुर्गम भाव समुद्र में प्रसाद जी अपनी लेखनी के माध्यम से तैर जाते हैं , यह उन्हीं की विशेषता हो सकती है । कालिदास की भाषा के समान प्रसाद जी की भी भाषा है ऐसा भी उन्होंने बताया।

इसके पश्चात सुधा पाठक ने अपनी कविता -"हिंदी साहित्य के थे वह प्रसाद, नाम था उनका जयशंकर प्रसाद।" प्रस्तुत किया। दरभंगा से विशंभर जी ने "कितना सुंदर कितना प्यारा, भारत जो है देश हमारा।"प्रस्तुत किया । इसी के साथ ही दर्शन की प्रोफेसर समांथा द्विवेदीने बताया की कविता में कुछ न कुछ जरूर रहता है ।साथी उन्होंने प्रसाद जी की समरसता भाव को अपने व्याख्या में व्याख्यायित किया। इसके पश्चात जूही झा ने कविता - "हे मातृ भूमि, हे भारत माता।
जूही झा अद्भुत कविता पाठ किया लेकर आओ कोई अवतार। प्रस्तुत किया।
आशीष अम्बर ने देशभक्ति पर बहुत सुंदर कविता पाठ की ,

अंत में डॉ.कविता प्रसाद जी ने कार्यक्रम की भूरि भूरि  प्रशंसा करते हुए धन्यवाद ज्ञापित करते हुए यह भी बताया कि इस कार्यक्रम को होते हुए लगभग दो महीने पूरे हो गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यह कार्यक्रम यूट्यूब और फेसबुक पर लाइक भी प्रसारित होता रहता है। इन महत्वपूर्ण जानकारी से सभी को अवगत कराया। और लोगों से निवेदन किया कि आप कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़ते रहें।


जुड़े लोग-

अमृता राव, प्रीति त्रिपाठी, वीरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. शिप्रा मिश्रा, डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय "साहित्सुधी", जूही झा, महालक्ष्मी कुशरी, रुक्मणी राय, सच्चिदानन्द साह, समर्थ द्विवेदी, संतोष के. बरनवाल, शुभम कुमारी मिश्रा, शुभम सिंह, स्मृति पाठक, वरुण कुमार गौतम, राजश्री तावरे, आशीष अम्बर, आनंद वर्मा, सीमा कुशवाहा, ज्योत्स्ना श्रीवास्तव, हिन्दी भाषा, के.के. एम.एम. (नाम स्पष्ट नहीं), डॉ. आशुतोष शास्त्री, गीता सहारिया, रत्ना यादव, राजवीर सिंह (अंतिम शब्द स्पष्ट नहीं) तथा डॉ. चन्द्रभान यादव।
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