Saturday, 1 August 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 02 अगस्त 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

02 अगस्त 2026 (रविवार)





कार्यक्रम सारांशिका (कार्यवृत्ति)

विषय - "भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में महाकाव्य 'कामायनी'"

आयोजक:
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)

तिथि: 2 अगस्त 2026 (रविवार)
समय: सायं 4:00 बजे से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet

कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती अनीता खरे (ग्वालियर) द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण माँ वीणा वंदना से हुआ। इसके उपरांत महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संरक्षक श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने मुख्य अतिथियों, वक्ताओं एवं समस्त विद्वज्जनों तथा श्रोताओं का आत्मीय स्वागत करते हुए अपने प्रेरणादायी उद्बोधन से कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।

व्याख्यान सत्र

1. प्रो. एस. वी. एस. एस. नारायण राजू

प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. एस. वी. एस. एस. नारायण राजू ने कहा कि कामायनी में मनु की 'चिंता' मानव जीवन के अंधकार और निराशा का प्रतीक है, जबकि 'श्रद्धा' ज्ञान, आशा और प्रकाश का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने उपनिषदों के आलोक में स्पष्ट किया कि प्रसाद जी ने कामायनी में व्यष्टि से समष्टि, अंधकार से प्रकाश तथा चिंता से आनंद की आध्यात्मिक एवं मानवीय यात्रा का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है। उनके अनुसार कामायनी का संदेश केवल बुद्धि का नहीं, बल्कि बुद्धि और हृदय के समन्वय द्वारा मानवता के कल्याण का संदेश है।

2. डॉ. कामाख्या नारायण सिंह

द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ. कामाख्या नारायण सिंह ने कहा कि जिस प्रकार कोई गोताखोर जितनी अधिक गहराई में उतरता है, उतने ही बहुमूल्य रत्न प्राप्त करता है, उसी प्रकार जयशंकर प्रसाद के साहित्य को भी वही व्यक्ति अधिक गहराई से समझ सकता है, जिसमें उतनी ही बौद्धिक एवं संवेदनात्मक क्षमता हो। उन्होंने प्रसाद जी के शब्द-प्रयोगों की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए 'बलि' शब्द की व्याख्या की। उनके अनुसार प्राचीन काल में 'बलि' का अर्थ व्यापक रूप से बलिदान था, किंतु आज उसका अर्थ संकुचित हो गया है, जो हमारी बदलती मानसिकता का परिचायक है।

3. आदरणीय मधुसूदन जी

अपने उद्बोधन में आदरणीय मधुसूदन जी ने जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि यद्यपि दोनों की साहित्य-दृष्टि भिन्न थी, फिर भी वे एक-दूसरे के साहित्यिक अवदान का सम्मान करते थे। उन्होंने अपनी कविता "समरसता का सनातन प्रसाद" प्रस्तुत करते हुए कहा—

«उन्नत सार्थक जीवन का
जयशंकर दे गए प्रसाद।
जिसने समझा साहित्य उनका,
मिटे उसके सारे अवसाद।।»

4. साहितेंदु जी

साहितेंदु जी ने अपने वक्तव्य में प्रसिद्ध दृष्टांत 'चार अंधे और हाथी' का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ और अनुभव के अनुसार ही जयशंकर प्रसाद के साहित्य की व्याख्या करता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य अत्यंत व्यापक, समृद्ध और बहुआयामी है। कामायनी केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और नवयुगीन चेतना का महाकाव्य है, जिसे समझने के लिए गहन अध्ययन और संवेदनशील दृष्टि आवश्यक है।


काव्य गोष्ठी

काव्य गोष्ठी का शुभारंभ कवि धर्मसिंह चक्रवर्ती ने सरस्वती वंदना स्वरूप अपनी रचना "माँ शारदे तुम्हें पुकारूँ, आकर ज्ञान बढ़ा देना" के भावपूर्ण पाठ से किया।

इसके पश्चात प्रो. अनीता खरे ने विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर हो रहे शोध कार्यों तथा विद्यार्थियों की बढ़ती रुचि पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कामायनी के श्रद्धा प्रसंग को केंद्र में रखकर एक मार्मिक कविता प्रस्तुत की, जिसमें जीवन-निर्माण और मानवीय मूल्यों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई।

अशोक गोयल ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कामायनी की दार्शनिक चेतना पर आधारित अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—

«सनातन ज्ञान की पावन अनूठी धार है इसमें,
चिंता और आनंद का सुंदर सृजन-विस्तार है इसमें।»

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उपस्थिति

कार्यक्रम में अशोक गोयल, डॉ. मृदुल कीर्ति, डॉ. जे. एस. यादव, डॉ. सुशील कुमार पांडे, डॉ. ऋचा शर्मा, खुशी सिंह, मीनू शर्मा, नितिशा कौशल, रेणुका सिंह, सच्चिदानंद शाह, शैलेंद्र मिश्रा, सोनू कुमार, राजेश कुमार सिंह, सीमा कुशवाहा, धर्मसिंह चक्रवर्ती, राम, महेश, आशीष, बृजेश, रणवीर सिंह, जितेंद्र सहित अनेक साहित्यप्रेमी एवं विद्वज्जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।


संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन

कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावशाली संचालन डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने किया।

अंत में श्रीमती कविता प्रसाद ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए विषय के प्रमुख बिंदुओं का सार प्रस्तुत किया। इसी के साथ कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। @all





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