Sunday, 28 June 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 28 जून 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

28 जून 2026 (रविवार)




कार्यवृत्त 

 राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी 

आयोजक: लिटरेचरनामा एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट
विषय: महाकवि जयशंकर प्रसाद की काव्य-दृष्टि : तुलनात्मक विमर्श
दिनांक: 28 जून 2026 (रविवार)
समय: सायं 4:00 बजे से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet (ऑनलाइन)


 बैठक का संचालन 

कार्यक्रम का अत्यंत प्रभावी एवं गरिमामय संचालन श्री विशाल मालवीय द्वारा किया गया। उन्होंने समस्त अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाया। विभिन्न सत्रों के मध्य उन्होंने विचारोत्तेजक प्रश्नों के माध्यम से चर्चा को और अधिक सारगर्भित बनाया तथा पूरे कार्यक्रम को सहज एवं अनुशासित रूप से संचालित किया।


 सरस्वती वंदना 

कार्यक्रम का शुभारंभ कु. मुस्कान कश्यप द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण सरस्वती वंदना से हुआ। उनकी मधुर प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक एवं साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।


 स्वागत वक्तव्य 

श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना, उसके उद्देश्यों, भावी योजनाओं एवं साहित्यिक दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि ट्रस्ट का उद्देश्य महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना, उनके साहित्य पर गंभीर विमर्श को बढ़ावा देना तथा राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक गतिविधियों का विस्तार करना है। साथ ही उन्होंने लिटरेचरनामा और महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संयुक्त प्रयासों, आगामी साहित्यिक परियोजनाओं, शोधपरक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं प्रकाशन योजनाओं की रूपरेखा भी साझा की।

 मुख्य व्याख्यान 

 1. विजय रंजन 


वरिष्ठ साहित्यकार श्री विजय रंजन ने अपने आलोचनात्मक व्याख्यान में गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा कामायनी एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद पर की गई आलोचनाओं का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया।

उन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से स्पष्ट किया कि मुक्तिबोध की आलोचना को उसके वैचारिक संदर्भ में समझना चाहिए तथा प्रसाद के साहित्य का मूल्यांकन उनकी संपूर्ण रचनात्मक दृष्टि के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रसाद की समग्र रचनावली, उनकी दार्शनिक चेतना, राष्ट्रीय दृष्टि, मानवीय संवेदनाओं तथा छायावादी काव्य परंपरा में उनके सर्वोच्च स्थान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने यह भी बताया कि कामायनी केवल एक काव्य नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और मानव चेतना का महाकाव्य है। मुक्तिबोध द्वारा उठाए गए अनेक प्रश्नों की उन्होंने तथ्यपरक प्रत्यालोचना प्रस्तुत की तथा प्रसाद की साहित्यिक महानता को विभिन्न आयामों से स्थापित किया।


2. डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु' 


डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु' ने अपने व्याख्यान में महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन, व्यक्तित्व एवं साहित्य का अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया।

उन्होंने अपनी चर्चित कृति "अभिज्ञान शाकुंतलम् और कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ" का उल्लेख करते हुए बताया कि कालिदास और जयशंकर प्रसाद की कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से भारतीय साहित्य की गहन सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपरा का बोध होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक पाठकों को भारतीय काव्य-दृष्टि, वैदिक ज्ञान एवं सांस्कृतिक चेतना को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान करती है।

उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया तथा उनके साहित्य में निहित भारतीय संस्कृति, शिव-तत्व, दर्शन और अध्यात्म के विविध आयामों को रेखांकित किया।

 प्रश्नोत्तर सत्र 

इस अवसर पर संचालक श्री विशाल मालवीय ने प्रश्न किया—

"कालिदास एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद—दोनों के जीवन और साहित्य में शिव-तत्त्व का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। क्या इसे उनकी व्यक्तिगत लेखन शैली माना जाए अथवा भारतीय साहित्यिक परंपरा का स्वाभाविक प्रभाव?"

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल चेतना में शिव का व्यापक स्थान है। उन्होंने बताया कि कामायनी तथा अभिज्ञान शाकुंतलम् दोनों की आरंभिक संरचना में शिव आराधना एवं मंगलाचरण की परंपरा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।


 काव्य गोष्ठी 

 दिलशाद बेगम (रायपुर, छत्तीसगढ़) 

उन्होंने "कहीं कोई स्वप्न तो नहीं हो तुम" शीर्षक से अत्यंत मधुर एवं भावपूर्ण कविता का पाठ किया। उनकी प्रस्तुति में प्रेम, संवेदना और मानवीय भावनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई दिया, जिसे सभी प्रतिभागियों ने सराहा।


 आशीष अंबर 

उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रसाद के साहित्य के विविध आयामों, उनकी राष्ट्रीय चेतना, मानवीय दृष्टि तथा साहित्यिक योगदान को सरल एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।


 सत्यम दुबे 

उन्होंने अपने काव्य-पाठ में जीवन में समय और घड़ी के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। उनकी कविता ने समय के सदुपयोग, जीवन के अनुशासन तथा मानवीय संघर्ष को संवेदनात्मक रूप में अभिव्यक्त किया, जिसे श्रोताओं ने विशेष रूप से सराहा।

 मुस्कान कश्यप 

सरस्वती वंदना के पश्चात उन्होंने अपनी मौलिक कविता का भी सुंदर एवं प्रभावशाली पाठ किया। उनकी प्रस्तुति में युवा संवेदनाओं, आत्मविश्वास तथा साहित्य के प्रति समर्पण की झलक दिखाई दी।


 रामबहाल सिंह बहाल कवि वाराणसी 

उन्होंने अपने काव्य एवं गायन की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। साथ ही महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, लिटरेचरनामा, आयोजकों एवं सभी साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपनी विशिष्ट शैली में कार्यक्रम को और अधिक ऊर्जावान बनाया।


अन्य प्रतिभागियों की सहभागिता

संगोष्ठी में उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने पूरे कार्यक्रम को गंभीरता से सुना तथा अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

उपस्थित प्रतिभागी:

1. अवधेश कुमार गुप्ता
2. कविता प्रसाद
3. विशाल मालवीय (Meeting Host)
4. मुस्कान कश्यप
5. आशीष अंबर
6. रामबहाल सिंह बहाल कवि वाराणसी 
7. दिलशाद बेगम
8. डॉ. शिप्रा मिश्रा
9. डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु'
10. डॉ. मृदुला रस्तोगी
11. हेमंत चौकियाल
12. एम. एक्ख्वाब के.
13. मधुसूदन
14. प्रतिमा नलिनी
15. रबिन्द्र कुमार
16. Ravindra ji
17. राजेश कुमार सिंह
18. विजय रंजन
19. सत्यम दुबे
20. अंशिका तिवारी
21. डॉ. रीतेश कुमार खरे 


निष्कर्ष

कार्यक्रम अत्यंत सफल, ज्ञानवर्धक एवं साहित्यिक दृष्टि से सार्थक रहा। मुख्य वक्ताओं के विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान, प्रश्नोत्तर सत्र तथा काव्य-पाठ ने संगोष्ठी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। सभी प्रतिभागियों ने भविष्य में भी ऐसे साहित्यिक आयोजनों के नियमित आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया तथा महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा के संयुक्त प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की।

कार्यक्रम का समापन सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। @all




Sunday, 21 June 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 21 जून 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

21 जून 2026 (रविवार)




संवाद सभा कार्यवृत्त

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

विषय : महाकवि जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम

दिनांक : 21 जून 2026
समय : सायं 4:00 बजे से 6:50 बजे तक
माध्यम : गूगल मीट (ऑनलाइन)
आयोजन : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा
संचालन : विशाल मालवीय


 कार्यक्रम का शुभारंभ 

 कार्यक्रम संचालक विशाल मालवीय 

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का शुभारंभ लिटरेचरनामा के प्रधान संपादक एवं कार्यक्रम संचालक विशाल मालवीय द्वारा किया गया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्तियाँ—

"शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्तविकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त, विजयिनी मानवता हो जाए।"

का सस्वर पाठ करते हुए कार्यक्रम का आरंभ किया।

उन्होंने उपस्थित सभी विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया। अपने प्रारंभिक उद्बोधन में उन्होंने लिटरेचरनामा तथा महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों संस्थाएँ साहित्य, संस्कृति, भाषा और भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सतत कार्य कर रही हैं।

उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन एवं साहित्य का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि प्रसाद केवल छायावाद के प्रमुख स्तंभ नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, इतिहास, राष्ट्रचेतना और मानवीय मूल्यों के महान व्याख्याता हैं। उन्होंने कामायनी, आँसू, लहर, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी जैसी कृतियों का उल्लेख करते हुए प्रसाद की बहुआयामी प्रतिभा को रेखांकित किया।


 सरस्वती वंदना 

 श्री ठाकुर 

इसके पश्चात श्री ठाकुर जी द्वारा माँ सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की गई। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ने ऑनलाइन मंच को भक्तिमय वातावरण से भर दिया। उनकी सुमधुर वाणी ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लिटरेचरनामा एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की ओर से उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया गया।

 स्वागत उद्बोधन एवं ट्रस्ट परिचय 

 कविता प्रसाद 

महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की अध्यक्षा कविता प्रसाद ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए ट्रस्ट के उद्देश्यों, कार्यों एवं भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद को केवल पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि चिंतक हैं, जिनके साहित्य में राष्ट्र, मानवता, संस्कृति, दर्शन और संवेदना का अद्भुत समन्वय मिलता है।

उन्होंने ट्रस्ट के गठन की पृष्ठभूमि, उसके उद्देश्यों तथा संस्थापक अवदेश कुमार गुप्ता के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद के साहित्य को समाज तक पहुँचाने, शोध को प्रोत्साहित करने तथा युवाओं को भारतीय साहित्य से जोड़ने हेतु ट्रस्ट विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता रहा है।


 मुख्य अतिथि 

 डॉ. सुशील कुमार  पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ 

मुख्य अतिथि डॉ. सुशीलकुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ ने आयोजकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि जयशंकर प्रसाद जैसे महाकवि पर केंद्रित संगोष्ठियाँ आज के समय की आवश्यकता हैं।

उन्होंने कहा कि प्रसाद केवल कवि नहीं, बल्कि नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार और दार्शनिक चिंतक भी थे। उनके साहित्य को किसी एक विधा में सीमित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने रोचक ढंग से कहा कि जैसे जयशंकर प्रसाद में "शंकर" हैं, वैसे ही करुणाशंकर उपाध्याय में भी "शंकर" हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में असाधारण साधना और सृजन के प्रतीक हैं।

उन्होंने विशेष रूप से प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की पुस्तक "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक प्रसाद के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।

उन्होंने बताया कि यह 464 पृष्ठों का शोधग्रंथ है जिसमें 18 प्रतिमानों के आधार पर प्रसाद की महानता का मूल्यांकन किया गया है। इसमें प्रसाद की आत्मवेदना, विश्ववेदना, आनंदवाद, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना, इतिहासबोध, मानवीय दृष्टि और विश्वमानवता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।


 मुख्य अतिथि - 

 प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय   

(मुंबई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर और अध्यक्ष , रक्षा विशेषज्ञ )

संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक सत्र प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय का अध्यक्षीय उद्बोधन रहा।

उन्होंने कहा कि छात्र जीवन से ही उन्हें यह अनुभव होता रहा कि हिंदी साहित्य में जयशंकर प्रसाद के साथ उतना न्याय नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। उन्हें प्रायः केवल छायावादी कवि या कामायनी के रचनाकार तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका साहित्य विश्व साहित्य के महानतम रचनाकारों के समकक्ष खड़ा होता है।

उन्होंने बताया कि इसी अनुभूति ने उन्हें "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" लिखने की प्रेरणा दी। वर्ष 1991 में आरंभ हुआ यह शोधकार्य लगभग 31 वर्षों तक चलता रहा और 2022 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल आलोचना नहीं बल्कि प्रसाद के विराट व्यक्तित्व का पुनर्मूल्यांकन है। इसमें 18 प्रतिमानों के माध्यम से उनकी महानता को समझने का प्रयास किया गया है। यह प्रतिमान भगवद्गीता के 18 अध्यायों की संरचना से प्रेरित हैं।

उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य मनुष्य को निराशा से आशा की ओर, विखंडन से समन्वय की ओर और दुःख से आनंद की ओर ले जाता है। कामायनी का आनंदवाद केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं बल्कि जीवन-दृष्टि है।

उन्होंने विस्तार से बताया कि बचपन में माता-पिता और बड़े भाई की मृत्यु जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रसाद ने अपनी व्यक्तिगत वेदना को समस्त मानवता की वेदना में रूपांतरित कर दिया। यही कारण है कि उनका साहित्य निजी अनुभवों से उठकर सार्वभौमिक मानवता का साहित्य बन जाता है।

उन्होंने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी और अन्य नाटकों की चर्चा करते हुए कहा कि प्रसाद ने भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित कर राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया। उनके नाटक केवल साहित्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दस्तावेज हैं।

उन्होंने अपनी शैक्षणिक एवं साहित्यिक यात्रा का भी परिचय दिया। उनका जन्म 15 अप्रैल 1968 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे वर्तमान में मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं। उनकी कुल 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने 38 पीएच.डी. एवं 55 एम.फिल. शोधार्थियों का निर्देशन किया है।

उन्होंने अपनी प्रमुख कृतियों—जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम, हिंदी का विश्वसंदर्भ, अप्रतिम भारत, आधुनिक कविता का पुनर्पाठ, कथासाहित्य का पुनर्पाठ, मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ, पाश्चात्य काव्यचिंतन आदि का उल्लेख करते हुए हिंदी आलोचना में उनके महत्व पर प्रकाश डाला।

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 प्रश्नोत्तर सत्र 

 सुनीता मंडल का प्रश्न 

सुनीता मंडल ने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित सभी विद्वानों को सुनकर वे स्वयं को धन्य अनुभव कर रही हैं। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वे "जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम" पुस्तक को अपनी निजी लाइब्रेरी में अवश्य रखेंगी।

उन्होंने प्रसाद की प्रसिद्ध कविता—

"ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे..."

के संदर्भ में प्रश्न किया।

उत्तर देते हुए प्रो. उपाध्याय ने कहा कि इस कविता को पलायनवाद के रूप में देखना भूल होगी। यह कविता आत्ममंथन, आत्मशक्ति संचय और अंतर्मुखी साधना की कविता है। उन्होंने बताया कि प्रसाद का साहित्य मनुष्य को संसार से भागने नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और अधिक सशक्त होकर लौटने की प्रेरणा देता है।


 विशाल मालवीय का प्रश्न 

विशाल मालवीय ने प्रश्न किया कि क्या पुस्तक लिखना प्रारंभ करते समय उन्हें अनुमान था कि इस कार्य में 31 वर्ष लग जाएंगे?

उत्तर में डॉ. उपाध्याय ने कहा कि किसी भी बड़े और गंभीर कार्य के लिए समय देना पड़ता है। उन्होंने बताया कि 1991 से 2022 तक उन्होंने इस विषय पर लगातार कार्य किया। इस दौरान अध्यापन, शोध और अन्य पुस्तकों के लेखन का कार्य भी चलता रहा। उन्होंने कहा कि यदि प्रसाद को न्याय दिलाने के लिए और अधिक समय देना पड़ता तो वे वह भी देने को तैयार रहते।


 अभिनव अरुण का वक्तव्य 

अभिनव अरुण ने हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हिंदी का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है और साहित्य से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है कि वे हिंदी की गरिमा और शुद्धता को बनाए रखें।

इस पर प्रो. उपाध्याय ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की भी भाषा है।


 वरुण सिंह गौतम का प्रश्न 

वरुण सिंह गौतम ने हिंदी के भविष्य, रोजगार और अंग्रेजी की बढ़ती प्रधानता पर प्रश्न उठाया।

उत्तर में प्रो. उपाध्याय ने हिंदी की वैज्ञानिकता, देवनागरी लिपि की ध्वन्यात्मक विशेषताओं, विश्व में हिंदी भाषियों की संख्या, डिजिटल माध्यमों में हिंदी की बढ़ती उपस्थिति तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में हिंदी की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक है और आज तकनीक, शिक्षा, व्यापार तथा वैश्विक संवाद में उसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।

आप इसे कार्यवृत्त में अलग शीर्षक के रूप में जोड़ सकते हैं:

 हिंदी का भविष्य : एक सार्थक विमर्श 

संगोष्ठी के दौरान "क्या हिंदी का भविष्य संकट में है?" विषय पर भी गंभीर एवं विचारोत्तेजक चर्चा हुई। इस चर्चा का प्रारंभ वरुण सिंह गौतम द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा, रोजगार, तकनीकी क्षेत्र तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेज़ी को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जिसके कारण युवाओं में यह धारणा बनती जा रही है कि हिंदी का भविष्य सुरक्षित नहीं है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब अधिकांश व्यावसायिक एवं तकनीकी अवसर अंग्रेज़ी से जुड़े हैं, तब हिंदी का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

इस पर संचालक विशाल मालवीय ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हिंदी का भविष्य संकट में नहीं है। हिंदी सदैव प्रासंगिक रही है और भविष्य में भी रहेगी। उन्होंने कहा कि किसी भाषा का महत्व केवल रोजगार से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक, सामाजिक और मानवीय प्रभाव से भी निर्धारित होता है। हिंदी करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति की भाषा है और उसकी जड़ें भारतीय समाज में अत्यंत गहरी हैं।

इसके उपरांत प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल भावों की भाषा नहीं, बल्कि आज ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में भी स्थापित हो रही है। उन्होंने बताया कि देवनागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है क्योंकि इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है।

उन्होंने कहा कि विश्वभर में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते और समझते हैं तथा यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, यूट्यूब, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा डिजिटल माध्यमों में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। आज बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियाँ हिंदी में अपने उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध करा रही हैं।

डॉ. उपाध्याय ने कहा कि हिंदी का संकट वास्तव में हिंदी का नहीं, बल्कि हिंदी के प्रति हमारे दृष्टिकोण का संकट है। यदि साहित्यकार, शिक्षक, विद्यार्थी और समाज मिलकर हिंदी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ, तो हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी को अंग्रेज़ी की प्रतिद्वंद्वी भाषा के रूप में नहीं, बल्कि विश्व संवाद की एक सशक्त भाषा के रूप में देखना चाहिए।

चर्चा के अंत में सभी प्रतिभागियों की यह सहमति रही कि हिंदी का भविष्य संकट में नहीं है, बल्कि बदलते समय के साथ उसका स्वरूप और विस्तार दोनों बढ़ रहे हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हिंदी के प्रति आत्मविश्वास और सम्मान का भाव बनाए रखा जाए तथा नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य और भाषा से जोड़ा जाए।


इस चर्चा के दौरान अभिनव अरुण, वरुण सिंह गौतम, विशाल मालवीय एवं प्रो. डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय के विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।


 रवीन्द्रनाथ ठाकुर एवं जयशंकर प्रसाद पर चर्चा 

चर्चा के दौरान रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि तथा जयशंकर प्रसाद के नाटकों की तुलनात्मक समीक्षा भी की गई।

डॉ. उपाध्याय ने कहा कि गीतांजलि आध्यात्मिक अंतर्मुखता का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि प्रसाद के नाटक राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक जागरण और ऐतिहासिक चेतना के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य किसी भी विश्वस्तरीय साहित्यकार की रचनाओं के समकक्ष खड़ा किया जा सकता है।

 आशीष अम्बर का वक्तव्य 

आशीष अम्बर ने प्रसाद के नाटकों, कहानियों, उपन्यासों और काव्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि अत्यंत कम आयु में प्रसाद ने जो साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, वे हिंदी साहित्य में अद्वितीय हैं।

 राष्ट्रपति से भेंट का प्रसंग 

विशाल मालवीय के प्रश्न के उत्तर में प्रो. उपाध्याय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से हुई अपनी भेंट का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पुस्तक को लेकर हुई चर्चा के दौरान निर्धारित समय से कहीं अधिक समय तक वार्ता चली। राष्ट्रपति महोदया ने जयशंकर प्रसाद के साहित्य में विशेष रुचि दिखाई तथा उनके साहित्यिक योगदान के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया।


 धन्यवाद ज्ञापन 

कार्यक्रम के अंत में महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के अध्यक्ष अवदेश कुमार गुप्ता ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 समापन 

अंत में संचालक विशाल मालवीय ने सभी प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने भविष्य में भी इसी प्रकार साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता बनाए रखने का आग्रह किया।

साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के प्रति समर्पण के संकल्प के साथ कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ।
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Sunday, 14 June 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 14 जून 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

14 जून 2026 (रविवार)




संवाद सभा कार्यवृत्त 

राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी

विषय: महाकवि जयशंकर प्रसाद : व्यक्तित्व, कृतित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
आयोजक: महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान
दिनांक: 14 जून 2026
समय: सायं 4:00 बजे से 6:45 बजे तक (२ घंटे ४५ मिनट)
माध्यम: गूगल मीट (ऑनलाइन)
संचालक: श्री विशाल मालवीय

1. उद्घोषणा एवं मंच संचालन

श्री विशाल मालवीय
प्रशंसा और सहभागिता : अपनी ओजस्वी वाणी, उत्कृष्ट भाषाई गरिमा और कुशल वक्तृत्व क्षमता के धनी श्री विशाल मालवीय ने इस संगोष्ठी में उद्घोषक (मंच संचालक) की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी सहज, प्रभावमयी और विचारोत्तेजक शैली से न केवल पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोए रखा, बल्कि प्रत्येक सत्र के बीच ऐसा सुंदर सामंजस्य स्थापित किया कि अंत तक श्रोताओं का उत्साह बना रहा। उनका संचालन इस संगोष्ठी की सफलता का मुख्य आधार स्तंभ रहा।

सरस्वती वंदना (मंगलाचरण)

सुश्री सरिता कोहिनूर
सुरों की साधिका और अपनी सुरीली व भावपूर्ण आवाज के लिए सराही जाने वाली सुश्री सरिता कोहिनूर ने ज्ञान की देवी मां शारदे की आराधना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उनके द्वारा प्रस्तुत की गई मंत्रमुग्ध कर देने वाली सरस्वती वंदना ने संपूर्ण सभागार को सकारात्मक ऊर्जा, शांति और आध्यात्मिक दिव्यता से सराबोर कर दिया। उनकी इस प्रस्तुति ने संगोष्ठी के लिए एक अत्यंत पवित्र और गरिमामयी वातावरण तैयार किया।

विशेष वक्तव्य (मुख्य व्याख्यान)
श्री अवधेश कुमार गुप्ता

प्रशंसा और सहभागिता : अपनी अगाध विद्वत्ता, गहन बौद्धिक अनुभव और वैचारिक स्पष्टता के लिए सुविख्यात श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने संगोष्ठी में अपना मुख्य एवं विशेष वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने संगोष्ठी के मूल विषय के गूढ़ और व्यावहारिक पक्षों पर अत्यंत सारगर्भित प्रकाश डाला। उनके तार्किक, शोधपरक और प्रेरणादायी विचारों ने न केवल विषय की समझ को गहरा किया, बल्कि उपस्थित शोधार्थियों और श्रोताओं को एक नई वैचारिक दृष्टि भी प्रदान की।

धन्यवाद ज्ञापन

श्री वरुण सिंह गौतम
प्रशंसा और सहभागिता:  संगोष्ठी के गरिमामयी और सफल समापन की बेला पर सभी अतिथियों, वक्ताओं, तकनीकी टीम और सहभागियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का उत्तरदायित्व श्री वरुण सिंह गौतम ने पूरी निष्ठा के साथ निभाया। उन्होंने अपने सौम्य, शालीन और आत्मीय व्यवहार से कार्यक्रम के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोगियों का आभार प्रकट किया। उनके इस धन्यवाद ज्ञापन ने संगोष्ठी को एक बेहद सकारात्मक, सौहार्दपूर्ण और आत्मीय मोड़ पर पहुँचाकर गरिमापूर्ण विदाई दी।

बैठक का विवरण

महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक विरासत, व्यक्तित्व, कृतित्व एवं उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर केंद्रित राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों, कवियों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत वक्तव्य से हुआ। श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने उपस्थित सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज और जीवन के व्यापक आयामों का साक्षात्कार भी कराता है। उन्होंने रचनाकारों से अपनी दृष्टि को अधिक समावेशी, व्यापक एवं मानवीय बनाने का आह्वान किया तथा लिटरेचरनामा संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

वक्तव्य एवं प्रस्तुतियाँ

श्री अनिल कुमार गुप्ता

उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी साहित्य के छायावाद काल (1918–1938) की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रसाद के साहित्य पर आज भी देश-विदेश में शोध कार्य जारी हैं। साथ ही नालंदा एवं राजगीर जैसे ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों में साहित्यिक स्मृतियों के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री मधुसूदन

उन्होंने जयशंकर प्रसाद को भारतीय संत साहित्यकारों की परंपरा में अत्यंत विशिष्ट स्थान प्रदान करते हुए उनके साहित्य में निहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तथा राष्ट्रीय चेतना का उल्लेख किया। उन्होंने प्रसाद के जीवन एवं साहित्य का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया तथा बिहार की सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कई साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विभूतियों का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक अस्मिता के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे।

श्री मनोज कुमार

उन्होंने जयशंकर प्रसाद की अमर कृति कामायनी के गीतों का भावपूर्ण एवं प्रभावशाली वाचन किया, जिसे श्रोताओं ने अत्यंत सराहा।

श्री विनय दास

उन्होंने प्रेमचंद एवं जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक दृष्टियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने दोनों साहित्यकारों के रचनात्मक सरोकारों और सामाजिक दृष्टिकोण पर विचार व्यक्त किए।

श्री दिनेश दास

उन्होंने कहा कि जीवन का यथार्थ छायावाद की मूल प्रेरणा है। उन्होंने कामायनी में प्रकृति, संवेदना, अंतर्मन और आत्मचिंतन के विविध आयामों की व्याख्या की।

श्रीमती अनीता खरे

उन्होंने कामायनी के श्रद्धा और ध्रुव तत्वों को केंद्र में रखकर काव्य-पाठ प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में आध्यात्मिकता एवं मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई दिया।

श्रीमती प्रियंका पुरोहित

उन्होंने नारी विमर्श विषय पर अपने विचार रखते हुए स्त्री गरिमा एवं सम्मान को समाज की मूल आवश्यकता बताया। महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक उत्तरदायित्व एवं नैतिक मूल्यों पर बल दिया।

श्री सुशील कुमार पांडेय

उन्होंने प्रेमचंद एवं जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए साहित्य की वैश्विक परंपरा और मानवतावादी दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने प्रसाद को महाकवि एवं विश्वकवि के रूप में स्मरण किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री आशीष अम्बर

उन्होंने बिहार की गौरवशाली सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परंपरा पर आधारित प्रभावशाली कविता का पाठ किया, जिसमें सम्राट अशोक, चाणक्य, हिमालय एवं गौतम बुद्ध जैसे प्रतीकों का उल्लेख था।

बहाल कवि

उन्होंने काशी, पंचकोशी यात्रा, मणिकर्णिका घाट तथा बनारस की सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित गीत एवं काव्य प्रस्तुति दी, जिसने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

श्री ठाकुर

उन्होंने कामायनी, छायावाद, प्रकृतिवाद एवं राष्ट्रवाद के विविध आयामों पर केंद्रित कविता पाठ एवं विचार प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति के उपरांत कविता में साधना, अध्ययन और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पर बल दिया गया।

प्रमुख निष्कर्ष

1. महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी भारतीय समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।


2. साहित्य को राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत और मानवीय संवेदनाओं के संवाहक के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।


3. युवा पीढ़ी को जयशंकर प्रसाद सहित भारतीय साहित्य की महान परंपरा से जोड़ने के लिए निरंतर साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।


4. साहित्यिक संवाद, शोध एवं सृजनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने हेतु ऐसे आयोजनों का नियमित आयोजन आवश्यक है।



धन्यवाद ज्ञापन

कार्यक्रम के अंत में श्री वरुण सिंह गौतम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों, श्रोताओं एवं आयोजकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने आयोजन की सफलता में सभी के योगदान की सराहना करते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार के साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता बनाए रखने का अनुरोध किया।

कार्यक्रम का सफल,

सुव्यवस्थित एवं गरिमामय संचालन श्री विशाल मालवीय द्वारा किया गया।

बैठक समाप्ति समय: सायं 6:45 बजे
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान @all

Sunday, 7 June 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 07 जून 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

07 जून 2026 (रविवार)




संवाद सभा कार्यवृत्त 

अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी 

विषय : प्रसाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता 

आयोजक संस्थाएँ : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान

दिनांक : 7 जून 2026 समय : सायं 5:00 बजे से 7:00 बजे तक माध्यम : Google Meet


 प्रस्तावना 

महाकवि जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के उन अमर साहित्यकारों में हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, मानवता, दर्शन, राष्ट्रचेतना और विश्वबंधुत्व की भावना को स्वर प्रदान किया। उनके साहित्य की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही सशक्त है जितनी उनके समय में थी। इसी उद्देश्य से महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में एक अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

 कार्यक्रम का मूल उद्देश्य

 महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य को वैश्विक संदर्भों में समझना, हिंदी साहित्य के वर्तमान स्वरूप पर विचार-विमर्श करना तथा भारत और विश्व के साहित्यिक समुदाय के मध्य संवाद का एक सशक्त मंच तैयार करना था। कार्यक्रम का केंद्रीय भाव था—

 “भारत से विश्व तक — हिंदी साहित्य का सेतु” 

 कार्यक्रम का शुभारंभ 

कार्यक्रम का शुभारंभ संगोष्ठी के संचालक एवं लिटरेचरनामा के प्रधान संपादक विशाल मालवीय के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने सभी प्रतिभागियों, साहित्यकारों, वक्ताओं एवं श्रोताओं का अभिनंदन करते हुए कहा कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाला सेतु है। उन्होंने इस आयोजन के उद्देश्य, विषय-वस्तु तथा कार्यक्रम की रूपरेखा से सभी को अवगत कराया।

इसके पश्चात श्रीमती प्रियंका भारती ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को ज्ञान, श्रद्धा, संवेदना और साहित्यिक चेतना से अनुप्राणित कर दिया।

 स्वागत वक्तव्य 

अवधेश कुमार गुप्ता ने स्वागत भाषण देते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की गतिविधियों, पूर्व में आयोजित कार्यक्रमों तथा भविष्य की साहित्यिक योजनाओं का परिचय कराया। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए साहित्यिक संवाद और विमर्श की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने ट्रस्ट और लिटरेचरनामा के संयुक्त प्रयासों की सराहना करते हुए इस आयोजन को हिंदी साहित्य के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

 संगोष्ठी सत्र 
प्रियंका पुरोहित —
सुश्री प्रियंका पुरोहित ने अपने वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति ‘कामायनी’ को आनंदवाद का महाकाव्य बताते हुए उसके दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्ष का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद जी ने ‘कलाधर’ नाम से ब्रजभाषा में अपनी साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ किया था। अपने वक्तव्य में उन्होंने ज्ञान का दीप, सकल विश्व की पीड़ा, मनु का संशय, श्रद्धा का विश्वास तथा विश्व-चेतना के विस्तार जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य मानवता, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करता है तथा वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके युग में था।

श्रवण कुमार पांडेय —
श्री श्रवण कुमार पांडेय ने काशी की सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक विरासत पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बनारस केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का जीवंत प्रतीक है। कबीर, तुलसी, भारतीय दर्शन और सनातन परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी स्वयं में एक संपूर्ण सभ्यता है। उन्होंने बनारस की गलियों, घाटों, संगीत, दर्शन और सांस्कृतिक विविधता को भारतीय आत्मा का स्वरूप बताते हुए कहा कि “यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि पूरा भारत है।”

डॉ. ओम सिंह —
डॉ. ओम सिंह ने महाकवि जयशंकर प्रसाद को छायावाद का उज्ज्वल नक्षत्र बताते हुए उनकी प्रमुख कृतियों ‘आँसू’, ‘लहर’ एवं ‘झरना’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य ज्ञान, सौंदर्य और मानवीय मूल्यों का समन्वित स्वरूप है। उन्होंने विशेष रूप से इस विचार को रेखांकित किया कि “ज्ञान किसी धर्म का दास नहीं होता”, जो प्रसाद के व्यापक और सार्वभौमिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।

सुशील कुमार पांडेय —
श्री सुशील कुमार पांडेय ने कहा कि यदि हिंदी भाषा और साहित्य की वास्तविक प्रतिष्ठा को समझना हो तो जयशंकर प्रसाद का गंभीर अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ का संदर्भ देते हुए आधुनिक मनुष्य के अवसाद, विषाद और आत्मसंघर्ष पर विचार व्यक्त किए तथा कहा कि प्रसाद का साहित्य व्यक्ति को स्वयं के व्यक्तित्व, संस्कृति और जीवन-दृष्टि का पुनर्मूल्यांकन करने की प्रेरणा देता है।

अभिनव अरुण —
श्री अभिनव अरुण ने जयशंकर प्रसाद के पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथानकों की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उनकी भाषा और शैली के आकर्षण का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद ने स्वान्तः सुखाय भाव से साहित्य सृजन किया, किंतु उनकी रचनाएँ कालजयी बन गईं। उन्होंने समकालीन हिंदी कविता की चुनौतियों और भाषा के बदलते स्वरूप पर भी विचार व्यक्त किए तथा अंत में अपनी ग़ज़ल का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कंचन सिंह परिहार —
सुश्री कंचन सिंह परिहार ने शिव-भक्ति पर आधारित अपनी रचना का पाठ किया। “शीश जटा कंठ...” जैसी पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक साधना की अनुभूति कराई। उनकी कविता में शंभू, बिंदु और सिंधु जैसे प्रतीकों के माध्यम से आत्मा के परमात्मा में विलय की भावना व्यक्त हुई।

मधुसूदन —
श्री मधुसूदन ने तप, त्याग, संघर्ष, संस्कृति और राष्ट्रचेतना पर आधारित कविता प्रस्तुत की। उन्होंने रामराज्य की आदर्श कल्पना, पुरुषोत्तम राम के चरित्र, मानवता, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए समाज के लिए आदर्श जीवन-दृष्टि का संदेश दिया।

रामबहाल सिंघ कवि —
श्री बहाल कवि ने मानवीय संघर्ष, संवेदना, प्रकृति-प्रेम और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी कविता का केंद्र बनाया। उन्होंने ‘कामायनी’ के संदर्भों के माध्यम से आदर्श नारी स्वरूप तथा मानवीय मूल्यों की चर्चा की और जीवन के संघर्षों के बीच आशा एवं सकारात्मकता का संदेश दिया।

मुनक्का मौर्य —
श्री मुनक्का मौर्य ने जयशंकर प्रसाद के जीवन और साहित्यिक योगदान पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि साहित्य सृजन के लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि आवश्यक है। अपनी कविता ‘नारी तेरे कितने रूप’ के माध्यम से उन्होंने नारी के वात्सल्य, त्याग, करुणा और सृजनात्मक शक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया।

विनय कुमार —
श्री विनय कुमार ने अपने मुक्तकों के माध्यम से बेटी, परिवार और मानवीय संबंधों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। “दुआओं में जिसे माँगा वही वरदान है बेटी” जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने प्रसाद के साहित्यिक योगदान का भी उल्लेख किया।

मंजू रानी सिंह —
श्रीमती मंजू रानी सिंह ने ‘बीती विभावरी जाग री’ की साहित्यिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ‘माँ’ शीर्षक कविता का पाठ किया। उनकी कविता में मातृत्व, त्याग, ममता और स्मृतियों का अत्यंत मार्मिक चित्रण था, जिसने सभी श्रोताओं को भावुक कर दिया।

मधुरिमा —
सुश्री मधुरिमा ने युवाओं को राष्ट्रनिर्माण, कर्तव्यबोध और कर्मशीलता का संदेश देते हुए प्रेरणादायी कविता प्रस्तुत की। “वीर तुम बढ़े चलो” जैसी पंक्तियों ने उपस्थित श्रोताओं में उत्साह और प्रेरणा का संचार किया।

विनय गुप्ता —
श्री विनय गुप्ता ने काशी, विश्वनाथ और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को केंद्र में रखकर अपनी रचना प्रस्तुत की। उन्होंने बनारस को ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक बताते हुए उसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा का प्रभावशाली वर्णन किया।

महेंद्र भीष्म —
श्री महेंद्र भीष्म ने अपनी कविता के माध्यम से संवेदनशील मानवीय भावनाओं को स्वर दिया। उनकी रचना में माँ, परिवार और जीवन की आत्मीय स्मृतियों का अत्यंत मार्मिक चित्रण था। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को गहरे भावबोध से जोड़ दिया।

सविता —
सुश्री सविता ने राधा-कृष्ण प्रेम को आधार बनाकर प्रेम, समर्पण और अस्मिता की भावनाओं को अभिव्यक्त किया। उनकी कविता में भक्ति और प्रेम का सुंदर समन्वय दिखाई दिया।

रतन कुमार —
श्री रतन कुमार ने “ज्ञान क्या है” शीर्षक कविता का पाठ किया। उन्होंने धन, श्रम, बुद्धि, जन्म और मृत्यु जैसे प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान के वास्तविक स्वरूप पर विचार प्रस्तुत किए।

आशीष अंबर —
श्री आशीष अंबर ने आत्मकथात्मक भावभूमि पर आधारित कविता का पाठ किया। उन्होंने गुरु की महिमा, ज्ञान के महत्व तथा जीवन के अनुभवों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

 कार्यक्रम की विशेष उपलब्धियाँ 

भारत के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों एवं हिंदी प्रेमियों की सक्रिय सहभागिता रही।

अमेरिका , कैलिफोर्निया सहित विदेशों से भी प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में सार्थक संवाद हुआ।

युवा रचनाकारों को अपनी रचनाओं के प्रस्तुतीकरण का मंच प्राप्त हुआ।

महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर विविध दृष्टिकोणों से गंभीर चर्चा हुई।

साहित्य और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संवाद को नई दिशा मिली।

 चर्चा के प्रमुख बिंदु 

1. जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है।
2. हिंदी साहित्य में निहित मानवीय मूल्य विश्व समुदाय को जोड़ने की क्षमता रखते हैं।
3. डिजिटल माध्यमों द्वारा हिंदी साहित्य को विश्वभर के पाठकों तक पहुँचाया जा सकता है।
4. नई पीढ़ी को भारतीय साहित्यिक विरासत से जोड़ने के लिए नियमित कार्यक्रम आवश्यक हैं।
5. साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रभावी माध्यम है।

 भविष्य की कार्ययोजना 

बैठक में निम्न प्रस्तावों पर सहमति बनी—

अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठियों का नियमित आयोजन किया जाएगा।
हिंदी साहित्य, भाषा और संस्कृति पर केंद्रित मासिक विमर्श आयोजित किए जाएंगे।
युवा साहित्यकारों एवं विद्यार्थियों को मंच प्रदान करने हेतु विशेष कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे।
महाकवि जयशंकर प्रसाद तथा अन्य महत्वपूर्ण साहित्यकारों पर व्याख्यानमालाओं का आयोजन किया जाएगा।
लिटरेचरनामा पत्रिका के माध्यम से देश-विदेश के रचनाकारों को जोड़ने का प्रयास और व्यापक किया जाएगा।
हिंदी साहित्य को विश्व मंच पर स्थापित करने हेतु विभिन्न देशों के साहित्यकारों से संवाद बढ़ाया जाएगा।

 धन्यवाद ज्ञापन 

कार्यक्रम के अंत में वरुण सिंह गौतम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, कवियों, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी की सक्रिय सहभागिता ने इस आयोजन को सफल एवं सार्थक बनाया।

 संचालक विशाल मालवीय ने सभी उपस्थित साहित्यप्रेमियों को धन्यवाद देते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहने का आग्रह किया।.

साहित्य प्रेमी और श्रोतागण 

सुषिल कुमार पांडेय | बहल कवि | के. एस. परिहार | डॉ. नीतू वर्मा | डॉ. ऋचा वर्मा | जय प्रकाश तिवारी | कविता प्रसाद | नंदना पी. अय्यर | प्रियंका पुरोहित | राहुल शिंदे | सुरेश पत्तर | विनय कुमार | विनय कुमार गुप्ता | आकांक्षा चौरसिया | नीरज भारद्वाज | शीला शर्मा | मधुसूदन | ममता सिंह | मुन्नका मौर्य | माधुरी करसाल | जय प्रकाश तिवारी | रतन कुमार | श्रवण कुमार पांडेय | विकाश पाठक | अब्दुल रहमान | दिव्यांशु गंगवार | सुनीता जौहरी | रतन कुमार | रागिनी राय | प्रोफेसर सविता चौधरी | विजय लक्ष्मी | महेंद्र भीष्म | फरीद अहमद | अरुण कुमार चतुर्वेदी | अविनाश कुमार शर्मा | अश्विनी तिवारी | अभिनव अरुण | मंजू रानी सिंह | ईशा जोधा | राजेश कुमार सिंह | चाहत सिंह | नितीश कुमार | अनीता खरे | अनिल कुमार मौर्य | खुशी सिंह | किसलय तरुण | राजेश | सनी सिंह | सरिता सिंघई | आकाश राहव रागु | चंचल | नीरू साहू | डॉ. ओम सिंह | रवीन्द्र सिंघई | चंद्रपाल | प्रियंका सोनी | उर्मिला शर्मा । प्रतिमा नलिनी | वरुण सिंह गौतम | विशाल मालवीय | कविता प्रसाद | अवधेश कुमार गुप्ता | संतोष कुमार सिंह | आशुतोष चौधरी | जातवेद सिंह | वेद ॠषि | कुमारी पांडेय | अपर्णा अरोड़ा

निष्कर्ष

महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी हिंदी साहित्य, भारतीय संस्कृति और वैश्विक साहित्यिक संवाद के मध्य एक महत्वपूर्ण सेतु सिद्ध हुई। कार्यक्रम ने यह स्थापित किया कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी मानवता, संस्कृति, संवेदना और विश्वबंधुत्व की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है।

यह आयोजन हिंदी साहित्य को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे विश्व मंच तक ले जाने की दिशा में एक सफल, सार्थक और प्रेरणादायी पहल के रूप में स्मरणीय रहेगा।




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