✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦
28 जून 2026 (रविवार)
कार्यवृत्त
राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी
आयोजक: लिटरेचरनामा एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट
विषय: महाकवि जयशंकर प्रसाद की काव्य-दृष्टि : तुलनात्मक विमर्श
दिनांक: 28 जून 2026 (रविवार)
समय: सायं 4:00 बजे से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet (ऑनलाइन)
बैठक का संचालन
कार्यक्रम का अत्यंत प्रभावी एवं गरिमामय संचालन श्री विशाल मालवीय द्वारा किया गया। उन्होंने समस्त अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाया। विभिन्न सत्रों के मध्य उन्होंने विचारोत्तेजक प्रश्नों के माध्यम से चर्चा को और अधिक सारगर्भित बनाया तथा पूरे कार्यक्रम को सहज एवं अनुशासित रूप से संचालित किया।
सरस्वती वंदना
कार्यक्रम का शुभारंभ कु. मुस्कान कश्यप द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण सरस्वती वंदना से हुआ। उनकी मधुर प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक एवं साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
स्वागत वक्तव्य
श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना, उसके उद्देश्यों, भावी योजनाओं एवं साहित्यिक दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि ट्रस्ट का उद्देश्य महाकवि जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना, उनके साहित्य पर गंभीर विमर्श को बढ़ावा देना तथा राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक गतिविधियों का विस्तार करना है। साथ ही उन्होंने लिटरेचरनामा और महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संयुक्त प्रयासों, आगामी साहित्यिक परियोजनाओं, शोधपरक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं प्रकाशन योजनाओं की रूपरेखा भी साझा की।
मुख्य व्याख्यान
1. विजय रंजन
वरिष्ठ साहित्यकार श्री विजय रंजन ने अपने आलोचनात्मक व्याख्यान में गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा कामायनी एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद पर की गई आलोचनाओं का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया।
उन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से स्पष्ट किया कि मुक्तिबोध की आलोचना को उसके वैचारिक संदर्भ में समझना चाहिए तथा प्रसाद के साहित्य का मूल्यांकन उनकी संपूर्ण रचनात्मक दृष्टि के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रसाद की समग्र रचनावली, उनकी दार्शनिक चेतना, राष्ट्रीय दृष्टि, मानवीय संवेदनाओं तथा छायावादी काव्य परंपरा में उनके सर्वोच्च स्थान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने यह भी बताया कि कामायनी केवल एक काव्य नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और मानव चेतना का महाकाव्य है। मुक्तिबोध द्वारा उठाए गए अनेक प्रश्नों की उन्होंने तथ्यपरक प्रत्यालोचना प्रस्तुत की तथा प्रसाद की साहित्यिक महानता को विभिन्न आयामों से स्थापित किया।
2. डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु'
डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु' ने अपने व्याख्यान में महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन, व्यक्तित्व एवं साहित्य का अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया।
उन्होंने अपनी चर्चित कृति "अभिज्ञान शाकुंतलम् और कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ" का उल्लेख करते हुए बताया कि कालिदास और जयशंकर प्रसाद की कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से भारतीय साहित्य की गहन सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपरा का बोध होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक पाठकों को भारतीय काव्य-दृष्टि, वैदिक ज्ञान एवं सांस्कृतिक चेतना को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान करती है।
उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया तथा उनके साहित्य में निहित भारतीय संस्कृति, शिव-तत्व, दर्शन और अध्यात्म के विविध आयामों को रेखांकित किया।
प्रश्नोत्तर सत्र
इस अवसर पर संचालक श्री विशाल मालवीय ने प्रश्न किया—
"कालिदास एवं महाकवि जयशंकर प्रसाद—दोनों के जीवन और साहित्य में शिव-तत्त्व का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। क्या इसे उनकी व्यक्तिगत लेखन शैली माना जाए अथवा भारतीय साहित्यिक परंपरा का स्वाभाविक प्रभाव?"
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल चेतना में शिव का व्यापक स्थान है। उन्होंने बताया कि कामायनी तथा अभिज्ञान शाकुंतलम् दोनों की आरंभिक संरचना में शिव आराधना एवं मंगलाचरण की परंपरा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।
काव्य गोष्ठी
दिलशाद बेगम (रायपुर, छत्तीसगढ़)
उन्होंने "कहीं कोई स्वप्न तो नहीं हो तुम" शीर्षक से अत्यंत मधुर एवं भावपूर्ण कविता का पाठ किया। उनकी प्रस्तुति में प्रेम, संवेदना और मानवीय भावनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई दिया, जिसे सभी प्रतिभागियों ने सराहा।
आशीष अंबर
उन्होंने महाकवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रसाद के साहित्य के विविध आयामों, उनकी राष्ट्रीय चेतना, मानवीय दृष्टि तथा साहित्यिक योगदान को सरल एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
सत्यम दुबे
उन्होंने अपने काव्य-पाठ में जीवन में समय और घड़ी के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। उनकी कविता ने समय के सदुपयोग, जीवन के अनुशासन तथा मानवीय संघर्ष को संवेदनात्मक रूप में अभिव्यक्त किया, जिसे श्रोताओं ने विशेष रूप से सराहा।
मुस्कान कश्यप
सरस्वती वंदना के पश्चात उन्होंने अपनी मौलिक कविता का भी सुंदर एवं प्रभावशाली पाठ किया। उनकी प्रस्तुति में युवा संवेदनाओं, आत्मविश्वास तथा साहित्य के प्रति समर्पण की झलक दिखाई दी।
रामबहाल सिंह बहाल कवि वाराणसी
उन्होंने अपने काव्य एवं गायन की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। साथ ही महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, लिटरेचरनामा, आयोजकों एवं सभी साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपनी विशिष्ट शैली में कार्यक्रम को और अधिक ऊर्जावान बनाया।
अन्य प्रतिभागियों की सहभागिता
संगोष्ठी में उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने पूरे कार्यक्रम को गंभीरता से सुना तथा अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
उपस्थित प्रतिभागी:
1. अवधेश कुमार गुप्ता
2. कविता प्रसाद
3. विशाल मालवीय (Meeting Host)
4. मुस्कान कश्यप
5. आशीष अंबर
6. रामबहाल सिंह बहाल कवि वाराणसी
7. दिलशाद बेगम
8. डॉ. शिप्रा मिश्रा
9. डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु'
10. डॉ. मृदुला रस्तोगी
11. हेमंत चौकियाल
12. एम. एक्ख्वाब के.
13. मधुसूदन
14. प्रतिमा नलिनी
15. रबिन्द्र कुमार
16. Ravindra ji
17. राजेश कुमार सिंह
18. विजय रंजन
19. सत्यम दुबे
20. अंशिका तिवारी
21. डॉ. रीतेश कुमार खरे
निष्कर्ष
कार्यक्रम अत्यंत सफल, ज्ञानवर्धक एवं साहित्यिक दृष्टि से सार्थक रहा। मुख्य वक्ताओं के विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान, प्रश्नोत्तर सत्र तथा काव्य-पाठ ने संगोष्ठी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। सभी प्रतिभागियों ने भविष्य में भी ऐसे साहित्यिक आयोजनों के नियमित आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया तथा महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा के संयुक्त प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की।
कार्यक्रम का समापन सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। @all
