✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦
07 जून 2026 (रविवार)
संवाद सभा कार्यवृत्त
अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी
विषय : प्रसाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता
आयोजक संस्थाएँ : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान
दिनांक : 7 जून 2026 समय : सायं 5:00 बजे से 7:00 बजे तक माध्यम : Google Meet
प्रस्तावना
महाकवि जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के उन अमर साहित्यकारों में हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, मानवता, दर्शन, राष्ट्रचेतना और विश्वबंधुत्व की भावना को स्वर प्रदान किया। उनके साहित्य की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही सशक्त है जितनी उनके समय में थी। इसी उद्देश्य से महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में एक अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का मूल उद्देश्य
महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य को वैश्विक संदर्भों में समझना, हिंदी साहित्य के वर्तमान स्वरूप पर विचार-विमर्श करना तथा भारत और विश्व के साहित्यिक समुदाय के मध्य संवाद का एक सशक्त मंच तैयार करना था। कार्यक्रम का केंद्रीय भाव था—
“भारत से विश्व तक — हिंदी साहित्य का सेतु”
कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ संगोष्ठी के संचालक एवं लिटरेचरनामा के प्रधान संपादक विशाल मालवीय के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने सभी प्रतिभागियों, साहित्यकारों, वक्ताओं एवं श्रोताओं का अभिनंदन करते हुए कहा कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाला सेतु है। उन्होंने इस आयोजन के उद्देश्य, विषय-वस्तु तथा कार्यक्रम की रूपरेखा से सभी को अवगत कराया।
इसके पश्चात श्रीमती प्रियंका भारती ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को ज्ञान, श्रद्धा, संवेदना और साहित्यिक चेतना से अनुप्राणित कर दिया।
स्वागत वक्तव्य
अवधेश कुमार गुप्ता ने स्वागत भाषण देते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की गतिविधियों, पूर्व में आयोजित कार्यक्रमों तथा भविष्य की साहित्यिक योजनाओं का परिचय कराया। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए साहित्यिक संवाद और विमर्श की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने ट्रस्ट और लिटरेचरनामा के संयुक्त प्रयासों की सराहना करते हुए इस आयोजन को हिंदी साहित्य के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
संगोष्ठी सत्र
प्रियंका पुरोहित —
सुश्री प्रियंका पुरोहित ने अपने वक्तव्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति ‘कामायनी’ को आनंदवाद का महाकाव्य बताते हुए उसके दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्ष का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद जी ने ‘कलाधर’ नाम से ब्रजभाषा में अपनी साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ किया था। अपने वक्तव्य में उन्होंने ज्ञान का दीप, सकल विश्व की पीड़ा, मनु का संशय, श्रद्धा का विश्वास तथा विश्व-चेतना के विस्तार जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य मानवता, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करता है तथा वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके युग में था।
श्रवण कुमार पांडेय —
श्री श्रवण कुमार पांडेय ने काशी की सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक विरासत पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बनारस केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का जीवंत प्रतीक है। कबीर, तुलसी, भारतीय दर्शन और सनातन परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी स्वयं में एक संपूर्ण सभ्यता है। उन्होंने बनारस की गलियों, घाटों, संगीत, दर्शन और सांस्कृतिक विविधता को भारतीय आत्मा का स्वरूप बताते हुए कहा कि “यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि पूरा भारत है।”
डॉ. ओम सिंह —
डॉ. ओम सिंह ने महाकवि जयशंकर प्रसाद को छायावाद का उज्ज्वल नक्षत्र बताते हुए उनकी प्रमुख कृतियों ‘आँसू’, ‘लहर’ एवं ‘झरना’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य ज्ञान, सौंदर्य और मानवीय मूल्यों का समन्वित स्वरूप है। उन्होंने विशेष रूप से इस विचार को रेखांकित किया कि “ज्ञान किसी धर्म का दास नहीं होता”, जो प्रसाद के व्यापक और सार्वभौमिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।
सुशील कुमार पांडेय —
श्री सुशील कुमार पांडेय ने कहा कि यदि हिंदी भाषा और साहित्य की वास्तविक प्रतिष्ठा को समझना हो तो जयशंकर प्रसाद का गंभीर अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ का संदर्भ देते हुए आधुनिक मनुष्य के अवसाद, विषाद और आत्मसंघर्ष पर विचार व्यक्त किए तथा कहा कि प्रसाद का साहित्य व्यक्ति को स्वयं के व्यक्तित्व, संस्कृति और जीवन-दृष्टि का पुनर्मूल्यांकन करने की प्रेरणा देता है।
अभिनव अरुण —
श्री अभिनव अरुण ने जयशंकर प्रसाद के पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथानकों की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उनकी भाषा और शैली के आकर्षण का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद ने स्वान्तः सुखाय भाव से साहित्य सृजन किया, किंतु उनकी रचनाएँ कालजयी बन गईं। उन्होंने समकालीन हिंदी कविता की चुनौतियों और भाषा के बदलते स्वरूप पर भी विचार व्यक्त किए तथा अंत में अपनी ग़ज़ल का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कंचन सिंह परिहार —
सुश्री कंचन सिंह परिहार ने शिव-भक्ति पर आधारित अपनी रचना का पाठ किया। “शीश जटा कंठ...” जैसी पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक साधना की अनुभूति कराई। उनकी कविता में शंभू, बिंदु और सिंधु जैसे प्रतीकों के माध्यम से आत्मा के परमात्मा में विलय की भावना व्यक्त हुई।
मधुसूदन —
श्री मधुसूदन ने तप, त्याग, संघर्ष, संस्कृति और राष्ट्रचेतना पर आधारित कविता प्रस्तुत की। उन्होंने रामराज्य की आदर्श कल्पना, पुरुषोत्तम राम के चरित्र, मानवता, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए समाज के लिए आदर्श जीवन-दृष्टि का संदेश दिया।
रामबहाल सिंघ कवि —
श्री बहाल कवि ने मानवीय संघर्ष, संवेदना, प्रकृति-प्रेम और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी कविता का केंद्र बनाया। उन्होंने ‘कामायनी’ के संदर्भों के माध्यम से आदर्श नारी स्वरूप तथा मानवीय मूल्यों की चर्चा की और जीवन के संघर्षों के बीच आशा एवं सकारात्मकता का संदेश दिया।
मुनक्का मौर्य —
श्री मुनक्का मौर्य ने जयशंकर प्रसाद के जीवन और साहित्यिक योगदान पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि साहित्य सृजन के लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि आवश्यक है। अपनी कविता ‘नारी तेरे कितने रूप’ के माध्यम से उन्होंने नारी के वात्सल्य, त्याग, करुणा और सृजनात्मक शक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया।
विनय कुमार —
श्री विनय कुमार ने अपने मुक्तकों के माध्यम से बेटी, परिवार और मानवीय संबंधों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। “दुआओं में जिसे माँगा वही वरदान है बेटी” जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने प्रसाद के साहित्यिक योगदान का भी उल्लेख किया।
मंजू रानी सिंह —
श्रीमती मंजू रानी सिंह ने ‘बीती विभावरी जाग री’ की साहित्यिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ‘माँ’ शीर्षक कविता का पाठ किया। उनकी कविता में मातृत्व, त्याग, ममता और स्मृतियों का अत्यंत मार्मिक चित्रण था, जिसने सभी श्रोताओं को भावुक कर दिया।
मधुरिमा —
सुश्री मधुरिमा ने युवाओं को राष्ट्रनिर्माण, कर्तव्यबोध और कर्मशीलता का संदेश देते हुए प्रेरणादायी कविता प्रस्तुत की। “वीर तुम बढ़े चलो” जैसी पंक्तियों ने उपस्थित श्रोताओं में उत्साह और प्रेरणा का संचार किया।
विनय गुप्ता —
श्री विनय गुप्ता ने काशी, विश्वनाथ और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को केंद्र में रखकर अपनी रचना प्रस्तुत की। उन्होंने बनारस को ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक बताते हुए उसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा का प्रभावशाली वर्णन किया।
महेंद्र भीष्म —
श्री महेंद्र भीष्म ने अपनी कविता के माध्यम से संवेदनशील मानवीय भावनाओं को स्वर दिया। उनकी रचना में माँ, परिवार और जीवन की आत्मीय स्मृतियों का अत्यंत मार्मिक चित्रण था। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को गहरे भावबोध से जोड़ दिया।
सविता —
सुश्री सविता ने राधा-कृष्ण प्रेम को आधार बनाकर प्रेम, समर्पण और अस्मिता की भावनाओं को अभिव्यक्त किया। उनकी कविता में भक्ति और प्रेम का सुंदर समन्वय दिखाई दिया।
रतन कुमार —
श्री रतन कुमार ने “ज्ञान क्या है” शीर्षक कविता का पाठ किया। उन्होंने धन, श्रम, बुद्धि, जन्म और मृत्यु जैसे प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान के वास्तविक स्वरूप पर विचार प्रस्तुत किए।
आशीष अंबर —
श्री आशीष अंबर ने आत्मकथात्मक भावभूमि पर आधारित कविता का पाठ किया। उन्होंने गुरु की महिमा, ज्ञान के महत्व तथा जीवन के अनुभवों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की विशेष उपलब्धियाँ
भारत के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों एवं हिंदी प्रेमियों की सक्रिय सहभागिता रही।
अमेरिका , कैलिफोर्निया सहित विदेशों से भी प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।
हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में सार्थक संवाद हुआ।
युवा रचनाकारों को अपनी रचनाओं के प्रस्तुतीकरण का मंच प्राप्त हुआ।
महाकवि जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर विविध दृष्टिकोणों से गंभीर चर्चा हुई।
साहित्य और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संवाद को नई दिशा मिली।
चर्चा के प्रमुख बिंदु
1. जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है।
2. हिंदी साहित्य में निहित मानवीय मूल्य विश्व समुदाय को जोड़ने की क्षमता रखते हैं।
3. डिजिटल माध्यमों द्वारा हिंदी साहित्य को विश्वभर के पाठकों तक पहुँचाया जा सकता है।
4. नई पीढ़ी को भारतीय साहित्यिक विरासत से जोड़ने के लिए नियमित कार्यक्रम आवश्यक हैं।
5. साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रभावी माध्यम है।
भविष्य की कार्ययोजना
बैठक में निम्न प्रस्तावों पर सहमति बनी—
अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठियों का नियमित आयोजन किया जाएगा।
हिंदी साहित्य, भाषा और संस्कृति पर केंद्रित मासिक विमर्श आयोजित किए जाएंगे।
युवा साहित्यकारों एवं विद्यार्थियों को मंच प्रदान करने हेतु विशेष कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे।
महाकवि जयशंकर प्रसाद तथा अन्य महत्वपूर्ण साहित्यकारों पर व्याख्यानमालाओं का आयोजन किया जाएगा।
लिटरेचरनामा पत्रिका के माध्यम से देश-विदेश के रचनाकारों को जोड़ने का प्रयास और व्यापक किया जाएगा।
हिंदी साहित्य को विश्व मंच पर स्थापित करने हेतु विभिन्न देशों के साहित्यकारों से संवाद बढ़ाया जाएगा।
धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम के अंत में वरुण सिंह गौतम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, कवियों, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी की सक्रिय सहभागिता ने इस आयोजन को सफल एवं सार्थक बनाया।
संचालक विशाल मालवीय ने सभी उपस्थित साहित्यप्रेमियों को धन्यवाद देते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहने का आग्रह किया।.
साहित्य प्रेमी और श्रोतागण
सुषिल कुमार पांडेय | बहल कवि | के. एस. परिहार | डॉ. नीतू वर्मा | डॉ. ऋचा वर्मा | जय प्रकाश तिवारी | कविता प्रसाद | नंदना पी. अय्यर | प्रियंका पुरोहित | राहुल शिंदे | सुरेश पत्तर | विनय कुमार | विनय कुमार गुप्ता | आकांक्षा चौरसिया | नीरज भारद्वाज | शीला शर्मा | मधुसूदन | ममता सिंह | मुन्नका मौर्य | माधुरी करसाल | जय प्रकाश तिवारी | रतन कुमार | श्रवण कुमार पांडेय | विकाश पाठक | अब्दुल रहमान | दिव्यांशु गंगवार | सुनीता जौहरी | रतन कुमार | रागिनी राय | प्रोफेसर सविता चौधरी | विजय लक्ष्मी | महेंद्र भीष्म | फरीद अहमद | अरुण कुमार चतुर्वेदी | अविनाश कुमार शर्मा | अश्विनी तिवारी | अभिनव अरुण | मंजू रानी सिंह | ईशा जोधा | राजेश कुमार सिंह | चाहत सिंह | नितीश कुमार | अनीता खरे | अनिल कुमार मौर्य | खुशी सिंह | किसलय तरुण | राजेश | सनी सिंह | सरिता सिंघई | आकाश राहव रागु | चंचल | नीरू साहू | डॉ. ओम सिंह | रवीन्द्र सिंघई | चंद्रपाल | प्रियंका सोनी | उर्मिला शर्मा । प्रतिमा नलिनी | वरुण सिंह गौतम | विशाल मालवीय | कविता प्रसाद | अवधेश कुमार गुप्ता | संतोष कुमार सिंह | आशुतोष चौधरी | जातवेद सिंह | वेद ॠषि | कुमारी पांडेय | अपर्णा अरोड़ा
निष्कर्ष
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी हिंदी साहित्य, भारतीय संस्कृति और वैश्विक साहित्यिक संवाद के मध्य एक महत्वपूर्ण सेतु सिद्ध हुई। कार्यक्रम ने यह स्थापित किया कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य आज भी मानवता, संस्कृति, संवेदना और विश्वबंधुत्व की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है।
यह आयोजन हिंदी साहित्य को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे विश्व मंच तक ले जाने की दिशा में एक सफल, सार्थक और प्रेरणादायी पहल के रूप में स्मरणीय रहेगा।


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