Sunday, 31 May 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 31 मई 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

31 मई 2026 (रविवार)




साप्ताहिक साहित्यिक संवाद सभा का कार्यवृत्त

विषय: साहित्य एवं सांस्कृतिक चेतना के परिप्रेक्ष्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता 

 विशेष विमर्श : महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अवदान

 कार्यक्रम विवरण :

  आयोजक : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा (संयुक्त तत्वावधान)
  माध्यम : गूगल मीट (ऑनलाइन)
 तिथि : 31 मई 2026
 समय : सायं 4:00 बजे से 6:45 बजे तक
 अवधि : 2 घंटे 45 मिनट

मंच संचालन एवं कार्यक्रम रूपरेखा:

 संचालन : श्री विशाल मालवीय (प्रधान संपादक, लिटरेचरनामा)

 सरस्वती वंदना : सुश्री स्नेहा तिवारी
 
  स्वागत वक्तव्य  : श्री अवधेश कुमार गुप्ता (संस्थापक एवं संयोजक, महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट)

 अंतिम विशेष वक्तव्य : सुश्री कविता प्रसाद (महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री)

 धन्यवाद ज्ञापन : श्री वरुण सिंह गौतम

 समापन : श्री विशाल मालवीय

 संगोष्ठी का विवरण:

भारतीय साहित्यिक परंपरा के महान उन्नायक और छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद के बहुआयामी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अवदान पर केंद्रित इस साप्ताहिक संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। यह मंच भारतीय ज्ञानपरंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और समकालीन विमर्शों के मध्य एक सार्थक संवाद का केंद्र सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ सुश्री स्नेहा तिवारी जी द्वारा प्रस्तुत मधुर सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात, श्री अवधेश कुमार गुप्ता जी ने स्वागत उद्बोधन के माध्यम से संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और सभी उपस्थित विद्वानों व शोधार्थियों का अभिनंदन किया। पूरे कार्यक्रम का सुव्यवस्थित और प्रभावी संचालन लिटरेचरनामा के प्रधान संपादक श्री विशाल मालवीय द्वारा किया गया।
 

प्रमुख वक्तव्य एवं साहित्यिक विमर्श:


 श्रीमती मंजू रानी सिंह : आपने प्रसाद जी के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ के माध्यम से स्त्री स्वाभिमान और वैचारिक स्वतंत्रता पर गंभीर विचार रखे। साथ ही ‘आँसू’ एवं ‘कामायनी’ के आलोक में आधुनिक स्त्री-चेतना की तुलनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।


 डॉ. सुशील कुमार पांडेय: आपने कालिदास की ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और प्रसाद की ‘कामायनी’ के प्रेम-दर्शन का सूक्ष्म विवेचन किया। आपने हिमालय और मानसरोवर को भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जीवंत प्रतीक के रूप में रेखांकित किया।


 श्री महेंद्र भीष्म : आपने हिंदी कहानी के विकासक्रम पर प्रकाश डालते हुए प्रसाद, प्रेमचंद और महादेवी वर्मा की परंपरा का उल्लेख किया। ‘ममता’ कहानी के माध्यम से आपने नारी जीवन की करुण यथार्थता का विश्लेषण किया।


 श्री पीयूष गोयल : आपने अपने दीर्घ लेखन अनुभव और ‘दर्पण-लेखन’ (Mirror Writing) की विशिष्ट साधना साझा की। आपने साहित्य में नवाचार की आवश्यकता पर बल देते हुए प्रसाद और प्रेमचंद के रचनात्मक योगदान को याद किया।

 श्री प्रणय श्रीवास्तव: आपने ‘आँसू’ काव्य के आधार पर प्रकृति और नारी-चेतना के विविध आयामों को बहुत ही सुंदरता से स्पष्ट किया।

 आचार्य डॉ विजय गुंजन : आपका वक्तव्य संगोष्ठी का मुख्य आकर्षण रहा। आपने ‘कामायनी’ को भारतीय मन और दर्शन का विराट आख्यान बताया। आपने स्वाध्याय, हिंदी की वैज्ञानिकता और छंद-परंपरा पर अपने गहन विचार साझा किए।

 डॉ. प्रफुल्ल कुमार : आपने वर्तमान उपभोक्तावादी युग में ‘कामायनी’ के पुनर्पाठ की आवश्यकता बताई और कहा कि प्रसाद का चिंतन मनुष्य को आत्मबोध और संतुलन की ओर ले जाता है।

 श्री मधुसूदन : आपने बिहार स्थित प्रसाद स्मृति भवन, राजगीर के संरक्षण और उसे एक सक्रिय सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की महत्वपूर्ण योजना प्रस्तुत की।

  श्रीमती पुष्पा रानी वर्मा:

 आपने छायावाद को हिंदी साहित्य का स्वर्णिम युग बताते हुए ‘आँसू’ के भाव-सौंदर्य पर चर्चा की और अपनी डायरी से प्रसाद जी को समर्पित एक भावपूर्ण कविता पढ़ी।

 श्री अर्जुन पांडेय : आपने अवधी भाषा में अपनी सृजनात्मक यात्रा का परिचय दिया और प्रसाद जी के सम्मान में अपनी कविता का प्रभावशाली पाठ किया।

  श्रीमती अनीता खरे: आपने अपनी कविता “हिंदी का सपना” के माध्यम से भाषा और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्नों को बड़े ही सशक्त ढंग से उठाया।

 सुश्री कविता प्रसाद (प्रपौत्री, महाकवि जयशंकर प्रसाद): 

आपने ‘ममता’ कहानी के संदर्भ में तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और सती-प्रथा जैसे विषयों पर विचार रखे। आपने स्पष्ट किया कि प्रसाद साहित्य आज भी सामाजिक चेतना के विकास में अत्यंत प्रासंगिक है।

उपस्थित साहित्यकार एवं प्रतिभागी:

संगोष्ठी में अंशिका तिवारी, अंकित मिश्रा, अंजलि कुमारी, अनीता खरे, अब्दुल रहमान, अर्जुन पांडेय, कविता प्रसाद, खुशबू शर्मा, डॉ. अर्जुन गुप्ता, डॉ. प्रफुल्ल कुमार, नवनीत मिश्रा, पीयूष गोयल, पुष्पा रानी वर्मा, प्रणय श्रीवास्तव, मंजू रानी सिंह, मधुसूदन, ममता सिंह, महेंद्र भीष्म, रीता गौतम, वरुण सिंह गौतम, मो. आतिक, आचार्य विजय गुंजन, डॉ. वंदना ठाकुर, आकांक्षा तिवारी, विशाल मालवीय, कविता बोरा, सनी सिंह, सिंह जी एवं हरि प्रकाश सहित अनेक साहित्यप्रेमी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

 निष्कर्ष 
संगोष्ठी से यह स्पष्ट हुआ कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य केवल धरोहर नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और दार्शनिक दृष्टि का अमूल्य कोश है। सभी विद्वानों ने नई पीढ़ी तक इस साहित्य को पहुँचाने और ऐसे आयोजनों को निरंतर जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

आयोजक:
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा @all 

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