✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦
05 जुलाई 2026 (रविवार)
कार्यवृत्त
अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी
आयोजक: महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान
विषय: "जयशंकर प्रसाद का समग्र साहित्य : नए विमर्श और वैश्विक संदर्भ"
उपविषय: "भारत और विश्व के साहित्यिक संवाद की एक साझा पहल"
तिथि: 05 जुलाई 2026 (रविवार)
समय: संगोष्ठी – सायं 4:00 से 5:00 बजे तक | काव्य गोष्ठी – सायं 5:00 से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet
कार्यक्रम संचालन एवं प्रारंभ
कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन वरुण सिंह गौतम (उप-संपादक, लिटरेचरनामा संस्थान) ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रियंका पुरोहित द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण एवं भक्तिमय सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक एवं साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
इसके उपरांत अवधेश कुमार गुप्ता ने स्वागत वक्तव्य देते हुए सभी देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, संस्कारों और सांस्कृतिक चेतना का संवाहक है तथा समाज को दिशा देने वाली सशक्त शक्ति है।
धन्यवाद ज्ञापन विशाल मालवीय द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने सभी मुख्य वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आयोजन की सफलता का श्रेय सभी सहभागी साहित्यकारों को दिया।
मुख्य वक्ताओं के व्याख्यान
1. डॉ. रितु शर्मा (नीदरलैंड)
नीदरलैंड की प्रवासी साहित्यकार एवं मुख्य वक्ता डॉ. रितु शर्मा ने "जयशंकर प्रसाद का समग्र साहित्य : नए विमर्श और वैश्विक संदर्भ" विषय पर अत्यंत प्रभावशाली व्याख्यान दिया। उन्होंने प्रसाद साहित्य को भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का वैश्विक प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन-दृष्टि, प्रकृति का मानवीकरण, आध्यात्मिक चेतना तथा मानवीय मूल्यों का अद्भुत समन्वय मिलता है। उन्होंने कामायनी के दार्शनिक पक्ष, भारतीय चिंतन, पश्चिमी पुनर्जागरण तथा आधुनिक वैश्विक संदर्भों के आलोक में प्रसाद साहित्य की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
2. डॉ. कविन्द्र नारायण
डॉ. कविन्द्र नारायण ने तुलनात्मक साहित्यिक दृष्टि से जयशंकर प्रसाद के बहुआयामी साहित्य का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि प्रसाद केवल एक कवि नहीं, बल्कि कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास और निबंध जैसी विविध विधाओं के अप्रतिम सर्जक हैं। उन्होंने प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों, राष्ट्रीय चेतना, वैदिक संस्कृति, वसुधैव कुटुम्बकम्, ज्ञान-इच्छा-कर्म के समन्वय तथा कामायनी को मानव-मन की विराट आध्यात्मिक यात्रा बताते हुए उन्हें आधुनिक भारतीय साहित्य का युगप्रवर्तक साहित्यकार निरूपित किया।
3. डॉ. दिनेश दास
पर्यावरणविद् डॉ. दिनेश दास ने प्रसाद साहित्य में निहित पर्यावरण चेतना, प्रकृति के मानवीकरण तथा मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि जयशंकर प्रसाद का साहित्य वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संतुलन तथा मानवीय संवेदनशीलता के लिए प्रेरणादायी मार्गदर्शक है और उनकी रचनाएँ आज भी पर्यावरणीय विमर्श को नई दिशा प्रदान करती हैं।
4. कामाख्या नारायण सिंह
कामाख्या नारायण सिंह ने जयशंकर प्रसाद के साहित्य में भाषा, दर्शन, राष्ट्रचेतना, विज्ञान-दृष्टि तथा ऐतिहासिक बोध का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रसाद की रचनाओं के माध्यम से महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चाणक्य, चंद्रगुप्त तथा दिनकर जैसे महापुरुषों के विचारों से उनके साहित्यिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय मूल्यों का सशक्त दस्तावेज है।
अन्य वक्ताओं एवं प्रस्तुतकर्ताओं की सहभागिता
इसके उपरांत डॉ. अनन्य, मणिशंकर दुबे, मुस्कान कश्यप, डॉ. शिप्रा मिश्रा, रमेश चंद्र गौतम, सुशील कुमार 'साहित्यइंदु', भव्य वर्मा, मधुमति जोशी, डॉ. पंकज वर्मा, दिलशाद बेगम तथा वैश्विनी ने अपने विचार, काव्य-पाठ, गीत एवं साहित्यिक प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को समृद्ध बनाया।
प्रतिभागियों की सहभागिता
संगोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी में कुल 43 साहित्यकारों, विद्वानों, शोधार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।
उपस्थित प्रतिभागियों के नाम निम्नलिखित हैं
अनंदी शिंदे, बाविता वर्मा, देव घोष, डॉ. ओम सिंह (अनन्या), डॉ. रितु शर्मा, दिलशाद बेगम, निकेश कुमार, डॉ. सुशील कुमार पांडेय, गीता पांडेय, हिमांशु त्रिपाठी, कामाख्या नारायण सिंह, डॉ. कविन्द्र नारायण, प्रियंका पुरोहित, मधुसूदन, ममता सिंह, डॉ. दिनेश दास, रमेश चंद्र गौतम, स्वर्णिमाबिंदु लोला, डॉ. राममणि शंकर दुबे, विशाल मालवीय, रीना सोपाम, रूबी सिंह, जलदूत किशोर, डॉ. शिप्रा मिश्रा, बृजेश यादव, निकेश कुमार, गर्ग मैडम, विवेक वर्मा, वरुण सिंह गौतम, आकाश राघव, विजय पाटिल, सुनीता शर्मा, सैंड्रा लोएटावान, मधुमति विजय जोशी, आशीष अंबर, के. सी. मेहता, दया एस. यादव, डॉ. पंकज वर्मा, कृष्ण आर्या, अपेक्षा, हर्ष, कृष्ण राम चौहान एवं पुष्पा जी।
निष्कर्ष
संगोष्ठी में उपस्थित सभी विद्वानों एवं साहित्यप्रेमियों ने एक स्वर से कहा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद का साहित्य भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता, मानवीय संवेदना तथा वैश्विक दृष्टि की अमूल्य धरोहर है। सभी ने उनके साहित्य के व्यापक अध्ययन, शोध एवं प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल देते हुए ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को निरंतर आयोजित किए जाने की अपेक्षा व्यक्त की।
यह आयोजन साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत सफल, सार्थक एवं ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ।


No comments:
Post a Comment